मंगलवार, 7 जुलाई 2026

हिंदू राष्ट्र मंदिरों में फसा हुआ

 लोकमत समाचार_20260626

भक्तों का विश्वास पुनः जीतना ही प्राथमिकता 

अभिलाष खांडेकर (वरिष्ठ पत्रकार)

मेरी टिप्पणीः लेखक साफ़ तौर पर मस्जिद को गिराकर मंदिर बनाने की प्रक्रिया की बात पर अपने आप को पूरी तरह से शामिल करते हुए दिखते हैं। लेकिन भक्तों का विश्वास पुनः जीतना ही प्राथमिकतावाली बात समझना मुश्किल है। ऐसा समझा जा सकता है कि, उनके और कई अन्य लोगों के लिए, आस्था सिर्फ़ दान देने तक सीमित नहीं है, उनके लिए, यह सिर्फ़ आशीर्वाद पाने के लिए नहीं, बल्कि भौतिकवाद पर ठहरी हुई है यानी कि मंदिर के ढांचे, ईंटें और पत्थरों, आभूषणों और् सजावट के लिए भी रखी जानी चाहिए, यह ही साबित होता है।

या तो फिर अहम बात यह होती है कि आस्था पर ठेस पहुंची है अगर श्री राम के नजरों तले चोरी हो रही हो तो श्री राम पर ही  से आस्था हट गई हो, लोगों का विश्वास पूरी तरह डगमगा गया हैऔर किसी भी तरह उस विश्वास को वापस लाना है क्योंकि स्वयं श्री राम को डगमगाना ना होना पड़े, श्रीराम मंदिर को डगमगाना ना होना पड़े!

 अगर हम ईंटें और पत्थरों, आभूषणों और सजावट की ही बात करें तो मंदिर तो शायद कब से खड़ा हो गया है अपनी पूरी भव्यता के साथ।  क्या होगा अगर चंदा की बहुत ज़्यादा अधिकता हो जाए? साफ़ है कि मंदिर बनाने में लगने से कहीं ज़्यादा इसकी अधिकता है। तो इस अधिकता का क्या मतलब है? यह मेरी बात गबन करने वालों का साथ देने जैसा है, लेकिन ऐसे चंदा चोरी, या गबन समाज का एक अभिन्न अंग बन चुका है, एक आम बात है जो बाकी जगहों पर भी होती आ रही है।

आप इसकी तुलना पूरे भारत से कर सकते हैं। भारत के पास पैसा है, बहुत बड़ी मात्रा में है, और यह किसी छोटे, वास्तविक राष्ट्र की सोच से कहीं आगे है। लोगों को इसका फायदा हो न हो, नेताओं यकीनन इसका लाभ लेते हैं और यही संयुक्त (अंग्रेज़ों द्वारा बनाया गया) भारत की पहेचान है।  गरीब कहलाने वाला यह देश कुछ मामलों में तो निहायत ही ओतप्रोत है, इस पर ग़ौर किया जाय।

लेखक ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी चिंतित कर दिया होगा।  राम मंदिर का संक्लप करता धराता वे ही थे. जिससे जो लोगों के दिल में उनके लिए आस्था प्रदान हुई है और उससे ही जो चुनावों मे मतें प्रदान हुए हैं.  हो न हो डर यह है कि सारी मेहनत पर पानी न फैल जाए!

लेखक 'राम या सीता जैसे देवी-देवताओं में हिंदू आस्था' की बात करते हैं। इसमें वे 'छोटे-मोटे राजनीतिक कार्यकर्ताओं' में आस्था को भी उन ईश्वरीय नामों में आस्था के साथ मिला-जुला रहे हैं, यह शायद मेल नहीं खाता।

लेखक का कहना है कि यदि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को साकार रूप देना है, तो राम, सीता, हनुमान, गणेस, शिव, पार्वती और अन्य देवी-देवताओं के प्रति हिंदुओं की आस्था की रक्षा के लिए देशभर के मंदिरों में मजबूत और मरोसेमंद व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी.

इस का मतलब यह होता है कि हिंदू राष्ट्र की पहचान मंदिरों में जमी पड़ी है.  इंटों और पत्थरों, आभूषणों और् सजावट से ही हिंदू राष्ट्र जुड़ा हुआ है. यानी कि भौतिकतावाद पर मोहर  ज़्यादा लगाई जानी चाहिए!  भारत आखिर में एक भौतिकतावादी प्रदर्शन है, लालच और अभिलाषा से बना हुआ प्रदर्शन!

 9:06 p.m. 07-07-2026  

 

 


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