शनिवार, 3 जनवरी 2026

साम्राज्य वाला बोझ

 लोकमत समाचार_20251222

भारत के खिलाफ बांग्लादेश में षड्यंत्र

चुनाव के पहले आग उगल रहे कट्टरपंथी, भारत को तोड़ने के ख्वाबों का खुलेआम इजहार

डॉ. विजय दर्डा


मेरी टिप्पणी - लेख में लिखा है: 'जनरल अब्दुल्लाहिल अमान आजमी बार-बार दोहराता है कि बांग्लादेश में शांति तभी आएगी जब भारत टुकड़ों में बंटेगा, नेशनल सिटिजन पार्टी का चीफ ऑर्गेनाइजर (दक्षिण), हसनत अब्दुल्लाह कहता है कि बांग्लादेश भारत के सेवेन सिस्टर्स (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा) को भारत से अलग कर देगा.'

इस में निहित यह है कि भारत को हमेशा के लिए उसकी एकता और अखंडता के बारे में फिक्र रहती है जो कि बांग्लादेश को इस बात की चिंता नहीं.  कहते हैं कि कांच के घर वाले पत्थर नहीं फेंकते. बांग्लादेश यहां पर निसंकोच पत्थर फैंक सकता है यह बांग्लादेश ने बेखूबी जान लिया है.

ऐसा क्यों है कि जो चीज़ भारत को लागू होती है, बांग्लादेश को नहीं?  यानी कि बांग्लादेश और भारत के बीच कभी दोस्ती नहीं हो सकती. दोस्ती बराबरों में होती है. और बराबरी करनी हो तो भारत टुकड़ों में बंटना चाहीए, और फिर जैसे कि  जनरल अब्दुल्लाहिल अमान आजमी बार-बार दोहराता है कि बांग्लादेश में शांति तभी आएगी जब भारत टुकड़ों में बंटेगा.

और बाकी सब तो ठीक, जहां पर हिंदू हिंदू वाली बात बनती हैजहां वह बात इतनी नहीं बनती यानी कि सात बहनों वाले प्रांतों  में,  अलगाववाद की बात पर आस बनाये बैठना अयोग्य नहीं है.

प्रश्न यह है कि ऐसी परिस्थिती क्यों है?  अंग्रेज चले गये. वे अपने जीवन निहायत ही चैन के साथ जी रहे हैं.  साम्राज्य वाला बोझ से वे कब से रिहा हो चुके हैं.  इतना ही नहीं जो कुछ भी लगे हुए हैं यानी कि स्कोटलेंड इत्यादी को पूरी रजामंदी है की अपना कारोबार खुद संभाले अगर वह चाहे.

यहां पर भारत के हाथ में साम्राज्य की पकड़ थमा कर गए.  और देखलो, उससे कितना भुगतना पड़ रहा है! कारण सिर्फ इतना की हम पकड़ किसी हिसाब से ढीली करना नहीं चाहते!

अगर इस पकड़ को ठीली कर दी जाय और कहा जाय कि आखिर में हम सब एक से ही है, बांग्लादेश हो या आसामतो फिर टुकड़ो में बांटने वाली बात ही रहेगी, न कोई ख़ास बड़ा कि न कोई ख़ास छोटा होगा. और जैसे कि बताया गया है कि तभी बांग्लादेश में शांती आएगी, या तो कम से कम  इस कारण से तो शांती नहीं रोकी जाएगी!

8:26 p.m. 03-01-2026


बुधवार, 26 नवंबर 2025

ईश्वर या कि मनुष्य न्याय व्यवस्था

 Sarita /society/

समाज

Judicial System : ईश्वर का न्याय बनाम  मनुष्य की बनाई कानून व्यवस्था

शकील प्रेम / May 30, 2025



मेरी टिप्पणीः अगस्त (प्रथम) अंक में प्रकाशित लेख  'फेल है ईश्वर की न्याय व्यवस्था' लेख सरिता में बार बार आते हुए, गहराई की रोशनी डालते हुए भी गहराई इतनी नहीं उतर पाती कि बात पूरी तरह से सुलझ जाये.

सरिता से ही उठाए गए ये शब्दों यह बताता है कि इस विषय का सुलझना अपने ही आंखो के सामने खड़ा है लेकिन हमें और आगे नहीं जाना है - 'बात तार्किक दृष्टिकोण से समझें तो सारे धर्मग्रंथ इतिहास के चालाक इंसानों ने ही लिखे हैं और इन चालाक लोगों ने ही अपने लाभ और परिस्थितियों के हिसाब से पाप और पुण्य की व्याख्या की है. यही वजह है कि जो धर्मग्रंथ जितना पुराना है वह आज उतना ही आउट डेटेड है और उस में लिखी बातें उतनी ही अप्रासंगिक हैं.'

मूलभूत बात यह है कि हम आज और कल को अलग अलग दर्जा दे रखा है. कल को पवित्र के क्षेणी में लिया जाता है, उससे ईश्वर से जुड़ा जाता है कि उससे हमें  डरना चाहिए जबकि आज से ईश्वर अप्रासंगिक रखा जाता है, आज की जो हम रह रहें जिंदगी को एक चोरीछुपी किये जाने वाली एक मानवीय कृति समझी जाती है. ईश्वर का न्याय बनाम  मनुष्य की बनाई कानून व्यवस्था’ इस शीर्षक में ही खोट नजर आती है कि ईश्वर और मनुष्य को अलग अलग रखा गया है जबकि दोनो भी एक ही संकल्पना है.  ईश्वर और उससे जुड़ा हुआ धर्म मनुष्य की ही कल्पना है.  और क्या मनुष्य की बनाई कानून व्यवस्था की बात क्या निजी मनूष्य की ही बात बनती है?  अगर कल ईश्वर लोगों के साथ हिलमिल करता था तो फिर आज भी वह अपने कंधे से कंधे मिलाकर फिर रहा है.

कल की बात पूरानी ऐसा समझ कर ईश्वर को भी पूराने वाले दर्जा दे कर  ढकेल दिया जाय और सिर्फ जब कभी त्योहार हो उसे मनुष्यों के दरबार में हाजिर किया जाय, पूजा की जाय, तो यह कोन सी ठीक बात बनती है?

 ईश्वर को मूर्तियों मे ढकेल देने के बजाय उसे हर एक कण में, वर्तमान के कण में, हर एक नियती के पल में, आदमी, बिल्ली, कुत्ते हर किसी में उनकी ही झलक समझना यह सब आपको विश्वास पैदा करना चाहिए. जन्म में भी ईश्वर, मरने में भी ईश्वर, मारने में भी ईश्वर,  उत्थान में भी ईश्वर, पतन में भी ईश्वर.   

ईश्वर हर पल के जिम्मेदार है. यह नहीं कि उसे मंदिर में बैठा दिया जाय और हम जो कहे उस हिसाब से वह रहे और हम समझे उस हिसाब से दुनिया भर के लोग रहे.  जिंदगी में बहुत कुछ बातें रास नहीं आतीं.  आपका का तो सिर्फ एक एक काम रहना चाहिए. कि ईश्वर की लीला देखते देखते अपनी जिंदगी को गुजारना चाहिए.

 5:40 p.m. 25-11-2025


शनिवार, 27 सितंबर 2025

नियमों की आवश्यकता के नाम पर !

Lokmat Times _20250922

अपने गिरेबां में भी झांकिए जनाब!

ड्रग्स तस्करी वाले देशों में भारत का नाम क्यों?  और क्या बांग्लादेश नें सैन्य अड्डा बनाएगा अमेरिका?

डॉ. विजय दर्डा

चेयरमेन, एडिटोरियल बोर्ड, लोकमत समूह


मेरी टिप्पणी - अंग्रेज़ अपने पीछे भारतीय नाम की एक जात छोड़ कर गए, जिन्हें उनके अधीन रहने वाले लोगों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसलिए, एक बार अपने मालिक के हाथों में रहे देश की बागडोर संभालने वाले भारतीयों को, एक पराधीन वर्ग के होने से, एक दुय्यम दर्जे के होने से दूर होने की उम्मीद नहीं की जा सकती. यानी कि जिनकी मानसिकता कभी भी एक मालिक जैसी खुली नहीं हो सकती, परिपक्व नहीं हो सकती! भारतीय होने का, गुलाम होने का कलंक, मीटे न मीटेगा!

 जब किसी भारतीय पर उंगली उठाई जाती है, तो वे तुरंत ही हड़बड़ा उठते हैं। लेकिन उंगली उठने में क्या गलत है? अगर सोच में छिछोरेपन न हो, तो कोई फर्क नहीं पड़ता। एक मिसाल के तौर पर अगर कोई परिवार कोविड से पीड़ित है, तो इस बात पर औरों का गौर करना और उनकी ओर उंगली उठाने में क्या गलत है? अगर आप किसी परिस्थिति से पीड़ित हैं, तो उन्हें मना क्यों करना चाहिए? जो सामने है उसे नजरअंदाज़ कैसे किया जा सकता है? लेखक: "सवाल यह है कि भारत जब खुद अंतराराष्टीय ड्रग क्रटेल से जुझ रहा है, चारों ओर से ड्रग्स भारत में भेजे जा रहे हैं तो फिर ड्र्स्स कारोबार में हमारी कोई भूमिका कैसे हो सकती है? " यह एक विरोधाभासी बयान है। भारत अपनी इस मामले में भूमिका निभा रहा है, चाहे वह इसे पसंद करे या नहीं। "ड्रग्स के खिलाफ भारत की सख्ती की सराहना भी कर दी गई है." प्रशंसा के साथ साथ 'ड्रग्स ट्रांजिट देश के रूप में भारत का नाम जोड़ना' पूरी तरह से उचीत बात ठहरती है.   इसमें कोई बुरी मंशा नहीं है! और अमेरिका एक खुला देश है। वह अपने पिछवाड़े को नहीं छिपा सकता। अपने गिरेबां में भी झांकिए जनाब!’  वाला शीर्षक यहाँ पर बिनमतलब का ठहरता है.

 चटगाँव, बांग्लादेश के होटल में 120 अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी एक रहस्योद्घाटन है। वह एक भयावह साज़िश ही समझी जा सकती है। मार्टिन द्वीप अमेरिका को मिल आए यदि ऐसा हो गाया तो वह स्थिति अत्यंत गंभीर होगी.’  यह बिलकूल डरावनी बात है.

 सऊदी अरब और पाकिस्तान का हाथ मिलाना एक अच्छे भारतीय का होशोहवास उबलने पर मजबूर कर देता है। भारत पाकिस्तान के साथ किए गए अच्छे व्यवहार को बर्दाश्त नहीं कर सकता। एक आम भारतीय को यह नहीं सोचना चाहिए कि श्री सैम पित्रोदा ने जो कुछ कहा है, कि हम सब एकसे हैं, झगड़ना क्यों? उससे उन सभी लोगों को घबराहट हो रही है जो नफरत के स्थापित रास्ते पर चलना चाहते हैं। गुलाम भारतीय दूसरी तरफ से देखना बर्दाश्त नहीं कर सकता। भारत के लिए पाकिस्तान पर उन हताश और दृढ़निश्चयी कश्मीरियों की मदद करने का दोष है जिन्हें आतंकवादी करार दे कर अपने आप को तसली देना चाहता है.

 क्या इसका मतलब यह होना चाहिए कि क्रिकेट मैच में हाथ नहीं मिलाना चाहिए? खैर, भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हर खिलाड़ी का अपना नज़रिया होता है। लेकिन एक 'सज्जनों' के खेल को और अधिक बदनाम करने के बजाय, और भले ही भारतीय सज्जन न होंजिस तरह वे खेलने के लिए बाध्य हुए क्योंकि 'नियमों की आवश्यकता थी',  उसी तरह हाथ मिलाना  भी बाध्य होना चाहिएनियमों की आवश्यकता के नाम पर.

2:52 p.m. 27-09-2025


रविवार, 20 जुलाई 2025

सीधी सी एक बात!!

 Sarita/editorial

Operation Sindoor : सिंदूर का राजनीतिकरण


मेरी टिप्पणी- भाजप जैसी वोटों बटोरने पर चित्त संस्था कोई नहीं होगी. हर पहलू में वोटों को तलाशने से  विरोधी पार्टीयों का आराम छीन कर रखा है. यह सब, पहलगाम हमला, एक मौके के तौर पर लिया गया है लेकिन आप की इस के पहले की संपादिका में (जुन प्रथम) उनसे पूरी सहमती जताई है, वहां तक की  आप ने कहा है कि कश्मीर का पहलगाम में की गयी आतंकवादियों की हरकतों का नुकसान पाकिस्तान की सेना के साथ वहां की आम जनता को भी सहना पड़ेगा, यह पक्का है.  मेरे लिए तो यह बात तो अत्यंत अस्वीकार करने वाली बात बनती है.

 भाजपा की बुनियादी ढांचा ही पाकिस्तान और पाकिस्तानियों या तो कहिये कि आम मुसलमानों को नफरत की नजरों से देखना,  इन से पाई हुई विरासत को भी रोजमर्रा ज़िन्दगी से मिटाना, यानीकि चमकीले शहरों के नाम जैसे, औरंगाबाद, इस्लामपूर को मिटाना .  हां. लेकीन आप भी इसमे शामिल होंगे इस की थोड़ी कम उमीद थी.

 अगर हम क्रिया और प्रतिक्रिया की बात करें तो एक बाजू है अनौपचारिक तौर पर बने पड़े थे चार-छे लोग, उसमें ज्यादा तर तो शुद्ध भारतीय नागरीक कहलाने वाले लोग थे.   और मरे, मारे तो कितने मरे?  लेकिन भारत की  तरफ से तो पूरजोश शुद्ध औपचारिक मामला बना.  मरने-मारने की तो कोई संख्या नहीं. करोड़ों रूपयों का मामला बना.  मिसाईल या कोई गोलाबारूद कोई सस्ते नहीं. और नहीं तो और  हमारी पूरज़ोर प्रतिक्रिया के बारे में दुनिया भर में विश्वास पैदा करने के लिए संसदीय प्रतिनिधिमंडल का भेजना, उसका सारा खर्च भी तो हुआ! और दुश्मनी को और मज़बूत करने पर विमानों को पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र से दूर हट कर चलाना पड़ना, उससे होता हुआ दुर्लभ इंधन व्यय, पैसे का व्यय और प्रदूषण में योगदान करना. ये सब का पहलगाम का प्रतिक्रया में शामिल होना!  इस टाईम का आतंकी हमला ने तो खासी कमाल कर दी!  

इस संपादकीय में (जुलै, प्रथम) आप ठीक लाईन में आ गये यह कह कर कि – पहलगाम में हुई 26 निर्दोष भारतीयों की मौतों की जिम्मेदारी मोदी के कंधे पर न आ जाए, इस के लिए पाकिस्तान पर बमबारी की गई.” बात गौरतलब है कि कश्मीर में सारी सरकारी यंत्रतंत्रे इस पर लगी हुई है कि जो हुआ वह न हो। पर इस टाईम भारतीय सरकार के यंत्रतंत्रे जरा मात खा गए. उसके बदले में पाकिस्तान की ओर बंदूक को दागना और पीछे अपने ही आंगन में यहांवहां घरों को जलाना, यह एक आत्मविष्वास का डगमगाने वाली बात दिखी.

आपने और कहा अपनी गलतियों को छिपाना और उन पर पानी फेरना हमारी संस्कृति का हिस्सा है.  यानीकि कहीए कि संस्कृति को सुझबुझ बिना सर्वोत्तम दर्जा नहीं मिलना चाहिये! यहां पर भारतीय संस्कृति  तो यह कहती है कि जो कोई भी कश्मीर को भारत से बिछड़ाना चाहते है वह देशद्रोही है, चाहे स्वयं काश्मिरी ही क्यों न हो!  संसदीय प्रतिनिधिमंडल का भी अहम काम असलियत छिपाना था। उनको सिर्फ आतंकी हमले पर ही लक्ष्य केंद्रीत करना था न कि कोई पीछे जमी हुई गल्तियों का अनुमान.

इस सिलसिले में हर एक पाकिस्तानी को दुश्मन समझना, उनका विज़ा रद्द करके उनको सीमापार ढकेलना, और नहीं तो और पाकिस्तानी कलाकारों के अंश कोई भारतीय सिनेमा में नजर न आये उस पर खबरदारी बरतना, यह सब हमारी मनमुराद संस्कृती में आ बैठता है. आज की भारतीय संस्कृती में कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है और इसे हर कोई विरोध करने वाला दुश्मन है. और इस पर हर कोई पाकिस्तानी विरोध न करे तो वह पाकिस्तानी कैसा?  इस दुशमनी को और परिभाषित करने की ज़रूरत नहीं बनती.

लेकिन यहां पर फिल्म दिवार का डायलोग बिल्कुल सटीक बैठता है.  भारत कहेगा कि मेरे पास एर शानदार भरोसेमंद सुरक्षा कवच है, शोहरत है, खुशहाली है, आगे दूर दूर तक प्रगती का पैगाम  है,  तो बोलो पाकिस्तान आप की पास क्या है?  पाकिस्तान कहेगा मेरे पास लोगों का दिल है.

इस डायलोग साफ तौर पर इस बात पर रोशनी डालता हुआ दिखाई पड़ रहा है कि पाकिस्तान और उनके चहेतों से संघर्श होना बंद क्यों नहीं हो पा रहा है.    

एक बात है जो हर बात का हल दिला सकता है. यह है कि संस्कृती  की खामिया को स्वीकार किया जाय जो इस लेख में आप ने किया है. संस्कृति आखिर में लोगों की अभिलाषाओं से बनती है. या तो मन की बात कह सकते हैं उससे बनती है. आदमी की मन की बात और उपरवाले की मन की बात कभी एक सी नहीं हो सकती. यह तो सब जानते हैं.  भारत, पाकिस्तान दोनों आदमियों की मन की बातों की देन है. सारी परेशानी इस मन की बात से जुड़ी हुई है. अगर कम से कम आज, मन की बातों को बाजू कर दें तो फिर होगा जो कुछ विधाता चाहता है, निसर्ग चाहता है.  विधाता यह चाहता है कि उसने तामीर की हुई भिन्नता को पूरा इन्साफ मिले.

 सिंधी हो या तामील या कि कश्मीरी सब विधाता की करामत है. आप जब राह पर कोई सिंधी या कश्मीरी से मिलते होंगे तो यह नहीं पूछते कि आप क्यों सिंधी हो या क्यों कश्मीरी हो.  आप का चेहरा वैसा क्यों है कि जैसा वह है?  सीधी सी एक बात!! जय हो विधाता की और संभालो आदमी निर्मित संस्कृतियों से!

11-22, 17-07-2025

सोमवार, 5 मई 2025

भारत-पाक साम्राज्य कब टूटे!

Lokmat Times_20250428

खून खौल रहा है, अबकी बार हो आरपार!

जनरल मुनीर के नफरती बयान से साफ हो गया था कि ये शख्स कश्मीर के लिए षड्यंत्र रच रहा है

डॉ. विजय दर्डा, चेरमैन, एडिटोरियल बोर्ड, लोकमत समूह

ये मजहबी जंग बिल्कुल नहीं है, ये नरपिशाचों  का खूनी कृत्य है. इसे खत्म करना होगा. 

  


   मेरी टिप्पणी – ऐसा कहा गया है कि जब आप बंदर पर हथियार से प्रहार करते हैं तो वह हथियार को दोष देता हैहत्यारा को नहीं.  यहां पर उससे बिल्कुल विपरीत,  हथियार कौनहत्यारा कौनइन पर नजर डाली जाय न डाली जायसीधा जनरल मुनीर की कमीज़ का ही कोलर पकड़ा गया है.  दोनो चीज़ों से आसानी बरतती है. एक बाजू सिर्फ हथियार का दोषी पाया जानादूसरी तरफ दूर बैठे बस एक पाकिस्तानी जनरल मुनीर को जिम्मेदार ठहराना.  सही में होंशियारी देखें तो जिम्मेदर तो सिर्फ उपरवाला ही बनता है.  खास कर के जहां मौत शामिल होवहां तो खैर उपरवाले कि ही मर्जी समझी जाती है.

खैर उपरवाले को कौन पूछे?  पूछे तो ठीक उसके नीचे जो है श्री मुनीर.  एक बाजू ठहरे राजा मुनीर और दूसरी बाजू है ठहरे राजा श्री मोदी.  यहां पर राजा़ओं के बीच का मामला हैप्रजा का नहींयह सिद्ध है. शुरु में एक राजा ने ही तो अपनी दुम बचाकर जम्मू-कश्मीर को भारत के राजा नेहरु को सौंप दिया था.

आखीर में इंडिया-पाकिस्तान कैसे बनेदोनों ही अंग्रेज़ साम्राज्य की देन है. साम्राज्यवाद इनकी बुनियाद है. यानी कि राजाओं का मामला है.  असली जो राजाओं थेजो जन्मजात राजाओं थे,  उनकी रियासतों को अंग्रेजों ने यूं ही जारी रखें थें. अंग्रेजों से आज़ादी के बाद उन को बेदखल कर दीये गये क्योंकि राजाओं की क्या हेसियत रही जब प्रजा को ही राजा बनने का मौका मिल गया हो!

अभी तो सब राजा बनकर चले हैं. चाहे मुनीर होमोदी हो कि इस लेख लिखने वाले श्री दर्डा.  श्री दर्डा ने कहाजो कई बार सुनाया गया है – ‘कश्मीर  भारत का हिस्सा थाहै और रहेगा.  यानी कि कश्मीर भारत के कब्ज़े में थाकब्ज़े में है और कब्ज़े में रहेगा. यह सब राजाओं के मुंह से सुनना अच्छा लगता हैजिन का युग शायद सारी दुनिया से रुखसत हो गया है.   एक भारत-पाकिस्तान हैं  जहां प्रजा को राजा बनने का मौका मिलता है और इस उपलब्धी को कौन छोड़ना चाहेगा?

है कोई एमएलेएमपी जो रातोरात करोड़पती नहीं बनना चाहता ?  सारा कुछ पैसे का मामला है.  लेकिन है कोई जो चीज़ है जो पैसे से नहीं पटाई जातीवह है कश्मीरियों की जिद्द.

लेख में वो भी तो आपकी कौम के थे!' (बांग्लादेशी) और 'वे भी तो आपकी ही कौम के हैं!’ (अफगानियों) आपने  यह कह कर आप भी उस खड्डे में गिरे जहां कि श्री मुनीर खुद गिरे हुए हैं.  मज़हब के नाम पर कौम बनाना अवैध करार कर देना चाहिए.  एक तो साम्राज्य पीछा छोड़ने का नाम नहीं लेतीऔर चोरी के साथ साथ सीना चोरी के तौर पर है यह धर्म के नाम पर है देश को बनानाजो कि भारत-पाकिस्तान है.  दोनों इस मामले में भी दुनिया के नाम पर कलंक है.

अंग्रेज गए तभी उन्होंने साम्राज्य को तोड़ कर जाना चाहिए था। चाहे कोई कुछ भी बोले.  जिन्नाहगांधीनेरहुआंबेडकर जो भी हो,  इनको तो बस साम्राज्य बहाल रखना था. और रखा भी! पर स्वतंत्रता का क्या मायने रखा जायवह आज की राजानुमा प्रजा ही जाने!  सही माने में साम्राज्य को रोक कर लोकतंत्र को लाना चाहिए था.  हर एक को अपना वतन अपनी अपनी मात्रुभाषाएं के सीमित तक के देश के लिए समर्पित होना चाहिए था जैसे कि सारी दुनिया में आम तौर पर है.  ऐसा होता तो गांधी और जिन्ना अपना हिंदू-मुसलमान ज़गड़ा अपने गुजरात तक ही सीमित रहता.  काश्मीर क्याऔर क्यों इस की बात तो कोसो दूर रहती.  देशों  के अपने अपने शकलें के लिए अपने अपने नुमाइंदें होते.

लेकिन अभी तो लोगों की नज़र बस इस पर सीमित है किउन्हों ने चोरीछुप्पी आकर हमारे  निर्दोष लोगों को मारे,  हम पर आतंक फैलाया है. हम भी कुछ कम नहीं है. हमारा आतंक तो अधिकृत रहेगावैद्द रहेगायहां के लोगों की मान्यता के साथसोच समझ के साथ.  आए हुए महेमान को उनका विझा रद्द करकेसामान का आदानप्रदान बंद करकेऔर पानी बंद करके हम अपनी ओर से ज़ोर कसेंगे! उससे परेशान सिर्फ निर्दोष आम आदमी ही क्यों न होभारत माता की जय!

छोटा एक काश्मीर की जिद्द ने न तो पाकिस्तान को छोड़ा है न कि भारत को. दोनो साम्राज्यों के बीचइन छोटा सा कश्मीर के नाम पर एक नाहक तबाही हो रही है जो सारी दुनिया देख रही है.  और नहीं तो औरहवाई क्षेत्र को बंद करने पर अंतर्राष्टीय निकायों द्वारा तत्काल निंदा की जानी चाहिए। ईंधन की बर्बादी को एक अपराध समझना चाहिए!  एक छोटा कश्मीर क्या क्या करायेगा इन साम्राजवादियों से?

शायद एक छोटा कश्मीर ही है जो इन दो साम्राजवादियों को सही मायने में आज़ादी का मायना बता सकता है.  आखीर में.  उम्मीद कायम रखें!    

१०.४४ सुबह, ०५-०५-२०२५