रविवार, 21 जून 2026

बंटवारे का मौका

 Faisalabad: The Untold Story of Lyllpur

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मेरी टिप्पणी - जी हाँ, जो आप कहते हैं वह सही है कि हिंदुस्तान का बटवारा अंग्रेज़ ने किया! अगर अंग्रेज बंटवारे का कोई मौका न देते तो बटवारा नहीं होता। अंग्रेज हिंदुस्तान नाम का कोई विकल्प न रखते तो हिंदुस्तान/पाकिस्तान बनने का कोई सवाल  न होता। लोगों का भारत चुनने की या पाकिस्तान चुनने की कोई बात ही न होती. लोगों को यहां से वहां नहीं होना पड़ता। लोगों को यूंही मंदिर, गुरुद्वारे छोड़ कर नहीं आना पड़ता। भारत के लिए तो खैर पाकिस्तान का हिस्सा 'मर' चुका है लेकिन काश्मीर में इसी बटवारे के नतीजे को जिन्दा रखा गया है। अगर पाकिस्तान ना रहे, भारत ना रहे तो फिर मंदिरें फिर से खुल सकते हैं, कश्मीरी पंडीत वापस न जा सकने की कोई वजह न रहेगी।

21-06-2026

एक प्रतिक्रिया - 

@sudhiryadav4315

Apke kahane ka matlab kya hai bhai, Ki hindustan naame na de kar agar india name hi rakhate to shyad batwara na hota

@hmdhebar3404

sudhiryadav4315 : नहीं। हिंदुस्तान, इंडिया, भारत सब एक ही चीज़ है। अंग्रेज के जाने बाद इन को बरकरार रखने के पीछे लोग न पड़ते तो बात कुछ और होती, ऐसा मेरा कहना है। भारतीय या पाकिस्तानी बनने के बजाए पंजाबी बनने पर ज़ोर देते तो इतनी दर्दनाक बात नहीं होती कि जो हुई। हय तय है कि कश्मीर अभी भी सुलग रहा है। इस के नाम से कम से कम लोग सीधे सोचने लगें इस पर उम्मीद कायम रखना ज़रूरी... धन्यवाद!

22-06-2026


कुछ और लोगों की टिप्पणियां

अन्य टिप्पणी, (अंग्रेज़ी से अनुवादित)

लायलपुर की स्थापना आधिकारिक तौर पर 1896 में हुई थी।

इसका नाम सर जेम्स ब्रॉडवुड लायल के नाम पर रखा गया था, जो पंजाब के लेफ्टिनेंट-गवर्नर थे और जिन्होंने नहर कॉलोनी के विकास का पुरजोर समर्थन किया था। शहर की योजना बहुत सोच-समझकर बनाई गई थी।

शहर का अनोखा डिज़ाइन

ब्रिटिश योजनाकारों ने लायलपुर को इस तरह डिज़ाइन किया: बीच में एक क्लॉक टावर (घंटा घर) और उससे बाहर की ओर निकलते आठ बाज़ार। ऊपर से देखने पर इसका लेआउट ब्रिटिश यूनियन जैक जैसा दिखता था।


ये आठ बाज़ार थे:

कचहरी बाज़ार / रेल बाज़ार / जंग बाज़ार / अमीनपुर बाज़ार / चिनियोट बाज़ार / मोंटगोमरी बाज़ार / भवना बाज़ार / सर्कुलर बाज़ार


 नहर कॉलोनियों में ज़मीन किसे मिली?

अंग्रेज़ों ने ज़मीन समान रूप से नहीं बांटी। इसके बजाय, ज़मीन का आवंटन बहुत सोच-समझकर किया गया। सैन्य उपनिवेशवादी (Military Colonists) इन्हें बड़े इलाके दिए गए: रिटायर सैनिक, सेना के पेंशनभोगी, और सैन्य कर्मियों के परिवार। ये अनुदान ब्रिटिश क्राउन के प्रति वफादारी के इनाम के तौर पर दिए गए थे।

खेती करने वाले बसने वाले (Agricultural Settlers) कई खेती करने वाले परिवारों को यहाँ बुलाया गया: अमृतसर, जालंधर, होशियारपुर, लुधियाना, फ़िरोज़पुर, अंबाला से। इन ज़िलों में ऐसे अनुभवी किसान थे जो सिंचाई वाली खेती से परिचित थे।


 आदिवासी समूह

अंग्रेज़ों ने कॉलोनी में जाट सिखों, राजपूतों, अराइनों और गुज्जरों को बसाया।

 

धार्मिक धार्मिक स्थापत्य अर्पण

कुछ ज़मीन इन्हें दी गई: दरगाहों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और शिक्षण संस्थानों को।


 बंटवारे से पहले ज़मीन के मालिक ज़्यादातर कौन थे?

बीसवीं सदी की शुरुआत तक, खेती की ज़मीन के सबसे बड़े मालिकों में सिख किसान शामिल थे। नहर कॉलोनी के सबसे सफल किसानों में से कई पूर्वी पंजाब से आए सिख बसने वाले थे। उन्हें बड़े अनुदान मिले क्योंकि: उनके पास खेती का अनुभव था। कई लोगों की पृष्ठभूमि सैन्य सेवा वाली थी। अंग्रेज़ उन्हें भरोसेमंद बसने वाले मानते थे। 1930 और 1940 के दशक तक, लायलपुर के आस-पास की सबसे उपजाऊ ज़मीनों के बड़े हिस्से पर सिख किसानों का कब्ज़ा हो गया था।


मेरी टिप्पणी (अंग्रेज़ी से अनुवादित): इतनी कीमती जानकारी के लिए धन्यवाद। मुझे याद है कि जब इसका नाम बदलकर फैसलाबाद कर दिया गया था, तो मैं बहुत परेशान हुआ था। लेकिन आपकी टिप्पणी से मेरी सोच बदली है। अगर लायलपुर आज के भारत का हिस्सा होता, तो भी इसका नाम बदल दिया जाता, क्योंकि भारत अपनी 5000 साल पुरानी संस्कृति को दूषित करने वाली किसी भी चीज़ को पसंद नहीं करता। हालाँकि, हमें यह मानना ​​होगा कि यह शहर अंग्रेजों से ज़्यादा यहाँ के मूल निवासियों के लिए बनाया गया था और इसके नाम का आधा हिस्सा पूरी तरह से हिंदू संस्कृति से जुड़ा था।

22-06-2026


एर और टिप्पणी, मूल अंग्रेजी से अनुवाद -  लायलपुर घंटाघर (या क्लॉक टावर) पर गुरुमुखी में लिखी बात का अनुवाद इस प्रकार है: - यह क्लॉक टावर चेनाब नहर इलाके के निवासियों ने अपनी दयालु महारानी विक्टोरिया की याद में बनवाया था। यह विक्रम संवत 1962 में बना था, यानी 57 साल पहले, यानी 1905 ईस्वी में।

ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादारी दिखाने के लिए इसमें 8 बाज़ार बनाए गए थे और इसके झंडे में यूनियन जैक  की तरह अलग-अलग दिशाओं में 8 लाइनें थीं। मेरी आंटी का जन्म लायलपुर में हुआ था और वे इसे इसी नाम से बुलाती थीं, जब तक कि लगभग 8 साल पहले उनका निधन नहीं हो गया। भारत के बंटवारे से पहले लायलपुर में हिंदू और सिख आबादी काफी बड़ी और समृद्ध थी।

30-06-2026


मेरी टिप्पणी: 5000 साल पुरानी इस सभ्यता के लिए सबसे परेशान करने वाली सच्चाई यह है कि ज़्यादातर आम लोगों को ब्रिटिश शासन पसंद था।
22-06-2026


मेरी अन्य एक टिप्पणीः  आज़ादी जो मिली वह नेहरू को मिली, और राज्यकर्ताओं को मिली। लोगों को यह सब मिला जो आप बता रहे हैं! 

Commented on Nanaksar: Guru Nanak Dev Ji's Forgotten Village in Pakistan

24-06-2026


शनिवार, 13 जून 2026

लोगों की अमानत

Youtube-इतने अमीर थे, पंजाबी!



@hmdhebar3404

भारत अंग्रेजों की अमानत थी। उसको हड़पने की कोशिश में इंडिया-पाकिस्तान बना और देखिए क्या हालत हुई लोगों की! लोगों की अमानत तो सिर्फ जो वे थे वह थी।  यानीकि जंग वाले या लाहोर वाले!

 09-06-2026


  मेरी टिप्पणी_२:  अंग्रेजों की अमानत पर देखो, गांधी, नेहरू कैसे टूट पड़े? यह मौका फिर न आयेगा! कहा कि जंग के गंदी गली कुूचों से क्या करना, सारा देश जो हाथ में आ रहा है!  घबराईए मत, हम सारी चीज़ें के नाम बदल देंगें, कि वह लूट न समझी जाय!

अंग्रेज जैसे बनने का मौका कैसे गवाया जाय?  अंग्रेजी भाषा को अपने हित के लिये आपनाने का मौका कैसे गवाया जाय?

कम से कम भारतीय बनो या तो बनो पाकिस्तानी, पंजाबी ठहरने से क्या फायदा?  बनो तहदिल से हिंदू या मुसलमान, न बने रहो सिर्फ जंगवाले पंजाबी!

हां, एक बात तय है, कि जंग की गंदी गलियां का जिक्र, विडियो तो यह ही दर्शाता है. गरीबी और अमीरी एक मानसिक पहलू है.  जिस को जो पसंद.  अमीर लोग चले जाने से उनकी जगा गरीब नहीं ले सकते!  जो संतुलन जो बिगड़ा, उसके लिए सिर्फ गांधी नेहरू और बनी वनाई लालच जिम्मेदार है।

11:52, 14-06-2026


गुरुवार, 4 जून 2026

श्रीकृष्ण की कुछ और ही सोच

 

संजीव दुबे,  एटावा, उत्तर प्रदेश

मुहम्मद गौरी का दूसरा आगमन... राहूल गांधी आज की पॉलिटिक्स में कोई आम चेहरा नहीं हैं, बल्कि एंटी-इंडिया इकोसिस्टम का सबसे बड़ा मोहरा हैं। उन्हें देखकर मुझे बार-बार भारतीय इतिहास के शायद सबसे काले पन्नों से मुहम्मद गौरी की याद आती है....

मुहम्मद गौरी 16 बार हारा लेकिन 17वीं बार जीतकर उन्होंने भारत को सदियों की गुलामी में डाल दिया। राहुल गांधी भी लगातार चुनाव हारते हैं, जनता उन्हें बार-बार रिजेक्ट करती है, लेकिन उनके पीछे लेफ्टिस्ट गैंग, इस्लामिक वोट बैंक और विदेशी ताकतों का ऐसा नेटवर्क है कि अगर वह एक बार भी कामयाब हो गए, तो वह भारत को उसी अंधेरे में धकेल देंगे।

मुहम्मद गौरी को उस समय भारत में कई गद्दारों का सपोर्ट था, और इसी तरह राहुल गांधी को आज के सेक्युलर हिंदू, जातिवादी पावर-ब्रोकर, विदेशी फंड से चलने वाले कन्वर्जन माफिया, तथाकथित शांतिप्रिय और टुकड़े-टुकड़े करने वाले गैंग सपोर्ट कर रहे हैं।

जब भी कोई सरकार घुसपैठियों, आतंकवादियों या धर्म बदलने वाले गैंग के खिलाफ एक्शन लेती है राहूल गांधी सवसे पहले उनका बचाव करने के लिए आगे आते हैं। यह कोई इत्तेफाक नहीं है, यह उनका एजेंडा है।

राम मंदिर बनने से लेकर आर्टिकल तीन सौ सत्तर हटाने, पहलगाम टेरर अटैक और ऑपरेशन सिंदूर तक, कांग्रेस और राहुल गांधी ने हमेशा हिंदुओं की आस्था और भारत की एकता का विरोध किया है।

हिंदू आतंकवाद की झूठी कहानी बनाकर पूरी दुनिया मे हिदुओं को बदनाम करने की गंदी साजिशों के  लिए वे ही जिम्मेदार हैं। पाकिस्तान और चीन की भाषा बोलना, मणिपुर की आग में घी डालना और अलगाववादियों को बढ़ावा देना यही उनकी पॉलिटिक्स है।

राहुल गांधी भारत की परंपराओं और सनातन धर्म पर सवाल उठाना कभी नहीं भूलते। हिंदू आस्था का सम्मान करना उनके DNA में नहीं है।

इसलिए इस्लामक वोट बैंक ही उनकी असली ताकत है।

नेहरू से लेकर सोनिया तक, कांग्रेस की विरासत भारत को कमजोर और विदेशी ताकतों पर निर्भर रखने की रही है। राहुल गांधी उसी एजेंडे के वारिस हैं।

उनका सपना भारत को आत्मनिर्भर बनाना नहीं, बल्कि इसे विदेशी ताकतों का गुलाम बनाए रखना है।

मुहम्मद गौरी ने तलवार के दम पर भारत को गुलाम बनाया था, राहुल गांधी भी तुष्टिकरण, वोट बैंक की राजनीति, विदेशी फंडिंग और धोखेबाज सेक्युलरिज्म से वही काम करना चाहते हैं। इसलिए, उन्हें मुहम्मद गैरी का दूसरा अवतार कहना कोई बड़ी बात न होगी.... उनके लिए भारत सिर्फ एक बाजार है और हिंदू धर्म सिर्फ एक मजाक है।

इसलिए राहुल गांधी को चुनाव हराना काफी नहीं है। असली राष्ट्रीय कर्तव्य उनकी पूरी राजनीति को जड से खत्म करना है। क्योंकि अगर हम भारत को नागरिक, एक बार भी गलती करते हैं, तो वह भारत को उसी गुलामी में डाल देंगे जो हमारे पूर्वजों ने सदियों तक झेली।

राहुल गांधी सिर्फ एक हारने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि भारत विरोधी ताकतों का एक जहरीला औजार हौ। 


मेरी टिप्पणीः आज के दिन भाजपा जैसी अपने आपको असुरक्षित समझने वाली और हठिली पार्टी कोई नहीं होगी. विडीयो में यह सब चुनावों की पृष्ठभूमि में ऐसे हथकंडे करने में भाजपा लाचार है.

मैं धोखेबाज सेक्युलरिज्मकी नुमाईंदगी करना चाहने वालों में से हूँ और यहां पर मेंने बाजी पलटने का मौका पाया है.

मेरे हिसाब से मुहम्मद गौरी की जितनी तुलना प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से की जा सकती है  उतनी तुलना राहुल गांधी से नहीं की जा सकती; जहां तक लोकतांत्रिक रवैयों की बात की जाय.

मुहम्मद गौरी के ज़माने में प्रजातंत्र प्रणाली थी ही नहीं कि जाना जाय कि वह कितना लोकतांत्रिक था.  उस वक़्त राजा और राजा की भीड़ हुई, तलवार निकली, कि जो जीता वह सिकंदर.  प्रजा सो कोई लेना देना नहीं. राजा बदलता, प्रजा वहीं के वहीं रहती. यह तो अंग्रेजों ने आकर गुल खिलाया, इस में प्रजा को भी पिरोही या गया,  और मच गई प्रजा में तबाही ही तबाही.

लेकिन हर एक की बात एक सी रही है।  हर एक का एजेंडा एक ही है। यानीकि भारत पर चढ़ाई करना! सिद्धांत सब का एक. फारसी भाषा पर काबू रखने वाले गौरी को गैर फार्सी पर धावा क्यों बोलना चाहा?  वैसे ही गैर हिंदी श्री नरेंद्र मोदी को हिंदी भाषीयों से क्या लेना देना होना चाहिए?  राहूल गांधी और उन्के टुकड़े-टुकड़े करने वाले गैंग भी ऐसा कुछ नहीं कहते की देश को सही पैमाने पर आज़ाद करवाना चाहते हैं।  सब का ही तो यही फैसला है कि अंग्रेजों से आज़ादी यानि की संपुर्ण आज़ादी.

लेकिन अंग्रेज हो या तो मुहम्मद गौरी, उनकी जितनी तारीफ की जाय इतनी कम है. दूरदराज़ समुद्रपार या वेरान रेगिस्तान से बिलकुल अनजान एलाके में आ कर चढ़ाई करना और अपने ताबे में लाना वह कतई आसान काम नहीं.  और यहां पर बैठे बैठे चढ़ाई करने का खेल श्री नरेंद्र मोदी और श्री रारुल गांधी मशगुल होते हुए हैं.

हां, पर इस लेख लिखने वाले, विडीयो बनाने वाले  संजीव दुबे ने तारीफ तो कर ही डाली यह कह कर कि सबसे काले पन्नों से मुहम्मद गौरी की याद आती है..., और राहुल गांधी की विदेशी ताकत भारत को उसी अंधेरे में धकेल कर  भारत को उसी गुलामी में डाल देंगे जो हमारे पूर्वज ने सदियों तक झेली।

एकटेदुकटे लोग जो भारतीयों के सेंकड़ो की सदियों तक गुलामी में रखने में कामयाब रहे उसे में से ही भारतीयों का कथाकठित 5000 वर्ष पुरानी संस्कृति का प्रमाण अपने आप उभर कर सामने आता है। यहां पर भाजप का असुर्क्षित होना, हठिली होने का कारण खुदबेखूद सामने आ जा रहा है.

एक तो दूर दराज़ से आना, न कोई स्थानीय भाषा का जानना,  भाषा सीखना और न सिर्फ सीखना अपनी भाषा सिखाना.  और इतनी सिखाना कि सारे देश की अधिकृत भाषा ही वह हो सके. और नहीं तो और इतनी सीखी-सिखाई जाय कि कुछ लोग उसे अपनी ही भाषा समझने लगे.  फारसी भाषा को लादना वह अपने आपकी अदभूत बात थी.  अंग्रेजी आई और आज भारत उसी भाषा पर टिका हुआ है चाहे आप अपने आप स्वतंत्र समझो या गुलाम.  जीत तो आखिर में बाहर की संकृती ही की हुई है.

फारसीओंने, अंग्रेजीओंने बानबनाए शहर, इमारतें, रास्ते के नामों बदल ने का काम अनैतिक कमों में विश्वास रखने वाले ही कर सकते हैं, कमज़ोर रही  सस्कृति ही करा सकती है.

श्री भागवद गीता दो हिस्सों में बटा है। एक है अर्जुन का हिस्सा, दुसरा श्री कृष्ण का हिस्सा.  महात्मा गांधी हो या कोई और, भारतीय संस्कृति सिर्फ अर्जुन तक ही सिमीत रह पाती है।  ‘मन की बात अर्जुन की इच्छाओं को दरशाता है. चाहे कितना ही राम मंदीर बनाया याद, पूजा, अर्चना, पाठ किया जाय, वह खाना, यह खाने पर परहेज़, व्रत रखें जाय, बाज़ी सारी विदेशियों के पक्ष में चले जाने की संभावना हमेशा रही है।

यही कुछ जवाब दे रही है कि भाजपा के लिए असुरक्षित सा माहोल क्यों सदा के लिए बना रहा है।  राहुल गांधी का चेहरा उनके लिए क्यों डरावना सा लगता रहता हैशायद वह समझ चुकें हैं कि श्री राम पर मात किया जा सकता है, पर श्री कृष्ण की कुछ और ही सोच रहती है.

यह तो सब बात करने की बात है.

4:33 p.m. 31-05-2026 


मंगलवार, 2 जून 2026

ग्रेटर बांग्लादेश

 Greater Bangladesh

मेरी टिपण्णी (पश्चिम) बंगाल को भारत से अलग करने का जो ग्रेटर बांग्लादेश वाला बनाने का मास्टर प्लान तैयार था उस पर भारत के आम वोटरसोने के ऐसी करारी चोट दी है कि आज सुपरपावरों के पसीने छूट रहें है’ 

ऐसा विचार इस विडीयो में पाया गया है।

मैं कहूं के यह तो बहुत अच्छी बात है कि ग्रेटर बांग्लादेश वजुद में आए.  विभाजन का असली मार पंजाब और बांग्ला पर हुआ.  पंजाब तैयार था, और बंगाल तैयार था, एक रहने के लिए लेकीन उस वक़्त के स्वतंत्रता सेनानी को ग्रेटर भारत की खोज थी.

मंमता बेनर्जी का रवैया कतई बांग्लादेश से हात मिलाने का नहीं रहा है.  हां, ऐसा कह सकतें हैं की सामनी ओर से मतदाता मिल जाने का उन्हें नागवारा नहीं होता होगा.

पश्चिम जर्मनी और पुर्वी जर्मनी एक हो गएंइसी तरह पश्चिम बेंगाल और पुर्व बेंगाल क्यों न एक हो जायहा, खूद एक होने चाहते हैं या नहीं यह एक बात रही, पर जो गैर बेंगाली है उनका क्या हक कि ऐसा न होने देने का?  

सब से बड़ा अपराध नेहरू के पक्ष में जाता है क्योंकि अंग्रेज से लूटी हुई अमानत में से कलकत्ता हट जाना उनको गवारा नहीं था।

4:55 p.m. 31-05-2026 

मंगलवार, 19 मई 2026

नाम बदलने की पहेली

सड़क के उस पार रहने वाले मेरे पड़ोसी, जिनसे मुझे रोज़ सुबह मिलने का मौका मिलता है, मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्हें 'लाम रोड' का नाम बदलने के बारे में पता चला। अब इस सड़क का नाम होगा: छत्रपति शिवाजी महाराज मार्ग (CSMM)

 मैंने उनसे कहा कि नाम बदलने की इन गतिविधियों में एक तय प्रक्रिया होनी चाहिए। वह प्रक्रिया यह है कि जनता से पूछा जाए कि क्या वे नाम बदलना चाहते हैं या पसंद करेंगे या नहीं। ज़्यादातर मामलों में, जवाब 'नहीं' ही होगा। आप किसी जगह के नाम को उसकी पहचान से जोड़ लेते हैं और उसे एक तय और अंतिम चीज़ मान लेते हैं। नाम बदलने का मतलब है पहचान बनाने की प्रक्रिया को फिर से शुरू करना। यह कुछ ऐसा लगता है, जैसे अचानक आपके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई हो।

 ऊपर बताई गई प्रक्रिया का पालन किए बिना ही 'लाम रोड' का नाम बदल दिया गया, और उन्होंने 'शिवाजी महाराज' के नाम की आड़ लेकर सुरक्षित रास्ता चुनाएक ऐसा नाम जो लोगों के दिल में सबसे महान मकाम रखता है और जिस पर कोई भी आपत्ति करने की हिम्मत नहीं कर सकता। हालाँकि, शिवाजी महाराज का 'देवलाली कैंप' से,  दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं हुआ होगा। मैंने अपने पड़ोसी से कहा कि किसी सिंधी व्यक्ति को भी यह सम्मान दिया जा सकता था। सिंधियों ने देवलाली कैंप के विकास में बहुत योगदान दिया है, और उनका कोई एक नाम आसानी से इस सड़क के लिए चुना जा सकता था।

 पड़ोसी ने मुख्य रूप से दो नामों का ज़िक्र किया, जिनका समाज-सेवा से गहरा नाता था। इनमें से एक है श्री वासु श्रॉफ, जिनका हाल ही में निधन हुआ है;  और दूसरे थे एक गैर-सिंधीएक पंजाबीमहाराज कृष्ण बिरमानी। उन्होंने आगे बताया कि श्री वासु श्रॉफ हमेशा अपने कामों का श्रेय लेने के इच्छुक रहते थे, जबकि श्री बिरमानी ने हमेशा बिना किसी दिखावे के उदारता दिखाई है।

 अचानक, जब मैंने श्री महाराज बिरमानी का नाम सुना, तो मेरी आँखों में एक चमक आ गई। मुझे पूरा यकीन है कि जो कोई भी उनसे जुड़ा  होगा, वह इस संभावना को सुनकर उसकी आंखो में भी चमक सी आ जाएगी। वैसे भी, दोनों नामों में 'महाराज' शब्द तो साझा है ही; इसके अलावा, अगर इस सड़क का नाम 'महाराज कृष्ण बिरमानी मार्ग' (MKBM) रखा जाता, तो इसमें स्थानीयता का पुट और भी गहरा अर्थ जुड़ जाता।  मैं यह बात, नाम बदलने की किसी भी प्रक्रिया के प्रति अपनी घोर नापसंदगी के बावजूद कह रहा हूँ।

 गहराई से सोचने पर यही लगता है कि आजकल हर जगह बस शिवाजी महाराज के नाम का ही जाप किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, एक शर्ट के बटन का नाम आसानी से 'छत्रपति शिवाजी महाराज बटन 1', 'छत्रपति शिवाजी महाराज बटन 2' आदि रखा जा सकता है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि बटनों, सड़कों और बगीचों के नाम तो इस मराठा आदर्श के नाम पर रखे जाते हैं, लेकिन खुद शर्ट का नाम, खुद शहर का नाम या खुद ज़िले का नाम नहीं हुआ है। इस मामले में, उनके बेटे संभाजी महाराज के नाम ने बाज़ी मारी ली है

 ऊपर बताई गई प्रक्रिया के बारे में सोचिएयानी जनता से यह पूछना कि क्या नाम बदलने की ज़रूरत हैअगर यह प्रक्रिया अपनाई जाती, तो औरंगाबाद को उसकी ऐतिहासिक जगह से हटाना इतना आसान नहीं होता। अब, जब वह प्रक्रिया लागू नहीं है और छत्रपति संभाजी महाराज का नाम आगे आ गया है, तो औरंगाबाद के लिए यह खेल खत्म जैसा है। 'छत्रपति संभाजी महाराज नगर' (CSMN) नाम ने उन सभी जगहों से औरंगाबाद का नाम हटा दिया है, जहाँ पहले औरंगाबाद का ही बोलबाला था। यानी हर जगहचाहे वह ज़िले का नाम हो या शहर का। शिवाजी महाराज के बेटे को यह दर्जा सिर्फ़ इसलिए मिला है, क्योंकि मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने उन्हें बेरहमी से यातनाएँ देकर मार डाला था।

 भारतीय हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवताओं में भगवान गणेश को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है; और ऐसा सिर्फ़ इसलिए है, क्योंकि उनका अपने पिता के साथ एक ऐसा टकराव हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें हाथी का सिर धारण करना पड़ा था।

 जैसा कि अक्सर होता है, देवलाली छावनी के हर अंग्रेज़ी नाम को चुन-चुनकर हटा दिया गया है। यहाँ तक कि अब बंद हो चुका कैथे सिनेमा को भी इस तरह के इस्तेमाल से नहीं बख्शा गया है। 

कहा जाता है कि 'लाम रोड' का 'लाम' किसी पारसी व्यक्ति का नाम पर था। श्री एम. के. बिरमानी की फ़ैक्टरी के एक हिस्से पर "J. N. Lam, Prospect Lodge, 1919" लिखा हुआ हैजो इतिहास का एक दिलचस्प हिस्सा है।

 यह सारी हलचल उस इतिहास के प्रति एक तरह की बगावत है, जिसे नियति या ईश्वर की मर्ज़ी ने रचा होता है। यह उस 'विश्व एक परिवार है' की अवधारणा के बिल्कुल विपरीत है, जिसका ज़िक्र हमारे धर्मग्रंथों में भी मिलता है।

 जीवन के हर पहलू की सराहना की जानी चाहिए। इसका मतलब कतई नहीं होता  कि हम जीवन के किसी खास हिस्से को किनारा कर दें और सिर्फ़ राष्ट्रवाद के नाम पर उससे नफ़रत करने लगें। यह उस राष्ट्रवाद की बात है, जो 'भारत' नामक एक ऐसे राष्ट्र के लिए हैजो अपने आप में एक इंसानी बनावट ही है, और जिसके जाल में हमारे सभी राष्ट्रीय नेता खुशी-खुशी फँसना चाहते हैं।

भारतीय राष्ट्रवाद का अर्थ है एक  ज़बरदस्ती की एकता एक बाजु और दूसरी ओर एक ज़ोरदार तमाचा विविधता के ऊपर!!

 


शिवानंद इलेक्ट्रॉनिक्स IPL परिसर में ऐतिहासिक प्रतिबंब

19-05-2026


टिप्पणी_2: नाम बदलने के इस सिलसिले की शुरुआत कहाँ से हुई, यह समझना काफी आसान है। इसकी जड़ें मोदी सरकार के इस जुनून में छिपी हैं कि वे पिछली ब्रिटिश हुकूमत को मिलने वाले श्रेय को कितना कम कर सकते हैं। भारत का हर कोना, हर हिस्सा किसी न किसी हद तक ब्रिटिश राज का ही ऋणी है; और ऐसे में, यह ज़रूरी हो गया है कि इन जगहों के नाम बदल दिए जाएँ। साथ ही, ताकि स्थानीय नायकों को लेकर कोई भ्रम न पैदा हो, केवल उस दौर के 'राष्ट्रवादी' नायकों को ही वह प्रमुखता दी जाती है, जिसके वे अक्सर हकदार माने जाते हैं।

इससे यह एहसास होता है कि भारत एक 'लूटी हुई संपत्ति' है। और इस कड़वी सच्चाई को छिपाने के लिए ही, नाम बदलने का यह सिलसिला इतना ज़रूरी बन गया है।

ब्रिटिश राज का अंत उन लोगों के लिए सबसे अहम पल साबित हुआ, जो उस 'संपत्ति' पर अपना कब्ज़ा बनाए रखना चाहते थे, लेकिन साथ ही यह भी नहीं चाहते थे कि इसका श्रेय किसी और को मिले।

अगर ब्रिटिश राज द्वारा स्थापित तंत्र और देश के कोने-कोने तक फैली व्यवस्था न होती, तो आज का भारत शायद कुछ और ही होता। तब शायद पंजाब में 'हिंदू-मुस्लिम' की पहचान से ज़्यादा 'पंजाबी' पहचान हावी होती; सिंध में भी 'हिंदू-मुस्लिम' या 'भारतीय-पाकिस्तानी' होने के बजाय 'सिंधी' पहचान ज़्यादा प्रमुख होती। और यह बात, यकीनन, किसी को भी मंज़ूर नहीं होती! यह न सिर्फ़ आज की BJP के लिए, बल्कि देश की तमाम 'राष्ट्रीय' पार्टियों के लिए एक घोर अस्वीकार्य स्थिति होती।

तो बात कुछ ऐसी है: भारत और पाकिस्तान का यह अस्तित्व और उनके बीच की यह पुरानी रंजिश, दोनों ही बनी रहेंयही बेहतर है। लेकिन ज़रा सावधान रहें: दूसरे पक्ष की तारीफ़ भूलकर भी न करें। बल्कि, उनके तमाम प्रतीकात्मक निशानों को पूरी तरह से मिटा दें।

 21-05-2021



टिप्पणी 3: BJP के लिए—एक हिंदू धार्मिक सोच वाली BJP के लिए—यह बात और भी ज़्यादा अस्वीकार्य है कि वह इसका श्रेय एकदम बाहरी लोगों को दे, ऐसे लोगों को जो खुलेआम गोमांस खाते हैं। वे भगवान को इस बात के लिए बिल्कुल माफ़ नहीं कर सकते कि उन्होंने भारत को ऐसी स्थिति में डाल दिया, जबकि यहाँ के लोग इतने ज़्यादा धार्मिक विचारों वाले हैं। इसलिए, ज़ाहिर तौर पर धार्मिक जोश से भरकर ही उन्होंने नामों को मिटाने का यह काम शुरू किया है। नतीजतन, हालात उससे कहीं ज़्यादा बुरे हो गए हैं जितने कि वे अन्यथा हो सकते थे।

इसलिए, आपके पास हार मान लेने के अलावा कोई चारा नहीं है। यहाँ तक कि भगवान भी इसमें आपकी मदद नहीं कर सकते।



टिप्पणी 4: पूरी दुनिया में धर्म ही हर चीज़ को परिभाषित करते हैं। इज़राइल, भारत-पाकिस्तान—इन सभी का अस्तित्व धर्म की ही देन है। चाहे कितनी भी मुसीबतें आई हों, या लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा हो। ये सब वहाँ इसलिए मौजूद हैं ताकि वे भगवान और तर्क-बुद्धि के विपरीत काम कर सकें।

24-05-2026