गुरुवार, 4 जून 2026

श्रीकृष्ण की कुछ और ही सोच

 

संजीव दुबे,  एटावा, उत्तर प्रदेश

मुहम्मद गौरी का दूसरा आगमन... राहूल गांधी आज की पॉलिटिक्स में कोई आम चेहरा नहीं हैं, बल्कि एंटी-इंडिया इकोसिस्टम का सबसे बड़ा मोहरा हैं। उन्हें देखकर मुझे बार-बार भारतीय इतिहास के शायद सबसे काले पन्नों से मुहम्मद गौरी की याद आती है....

मुहम्मद गौरी 16 बार हारा लेकिन 17वीं बार जीतकर उन्होंने भारत को सदियों की गुलामी में डाल दिया। राहुल गांधी भी लगातार चुनाव हारते हैं, जनता उन्हें बार-बार रिजेक्ट करती है, लेकिन उनके पीछे लेफ्टिस्ट गैंग, इस्लामिक वोट बैंक और विदेशी ताकतों का ऐसा नेटवर्क है कि अगर वह एक बार भी कामयाब हो गए, तो वह भारत को उसी अंधेरे में धकेल देंगे।

मुहम्मद गौरी को उस समय भारत में कई गद्दारों का सपोर्ट था, और इसी तरह राहुल गांधी को आज के सेक्युलर हिंदू, जातिवादी पावर-ब्रोकर, विदेशी फंड से चलने वाले कन्वर्जन माफिया, तथाकथित शांतिप्रिय और टुकड़े-टुकड़े करने वाले गैंग सपोर्ट कर रहे हैं।

जब भी कोई सरकार घुसपैठियों, आतंकवादियों या धर्म बदलने वाले गैंग के खिलाफ एक्शन लेती है राहूल गांधी सवसे पहले उनका बचाव करने के लिए आगे आते हैं। यह कोई इत्तेफाक नहीं है, यह उनका एजेंडा है।

राम मंदिर बनने से लेकर आर्टिकल तीन सौ सत्तर हटाने, पहलगाम टेरर अटैक और ऑपरेशन सिंदूर तक, कांग्रेस और राहुल गांधी ने हमेशा हिंदुओं की आस्था और भारत की एकता का विरोध किया है।

हिंदू आतंकवाद की झूठी कहानी बनाकर पूरी दुनिया मे हिदुओं को बदनाम करने की गंदी साजिशों के  लिए वे ही जिम्मेदार हैं। पाकिस्तान और चीन की भाषा बोलना, मणिपुर की आग में घी डालना और अलगाववादियों को बढ़ावा देना यही उनकी पॉलिटिक्स है।

राहुल गांधी भारत की परंपराओं और सनातन धर्म पर सवाल उठाना कभी नहीं भूलते। हिंदू आस्था का सम्मान करना उनके DNA में नहीं है।

इसलिए इस्लामक वोट बैंक ही उनकी असली ताकत है।

नेहरू से लेकर सोनिया तक, कांग्रेस की विरासत भारत को कमजोर और विदेशी ताकतों पर निर्भर रखने की रही है। राहुल गांधी उसी एजेंडे के वारिस हैं।

उनका सपना भारत को आत्मनिर्भर बनाना नहीं, बल्कि इसे विदेशी ताकतों का गुलाम बनाए रखना है।

मुहम्मद गौरी ने तलवार के दम पर भारत को गुलाम बनाया था, राहुल गांधी भी तुष्टिकरण, वोट बैंक की राजनीति, विदेशी फंडिंग और धोखेबाज सेक्युलरिज्म से वही काम करना चाहते हैं। इसलिए, उन्हें मुहम्मद गैरी का दूसरा अवतार कहना कोई बड़ी बात न होगी.... उनके लिए भारत सिर्फ एक बाजार है और हिंदू धर्म सिर्फ एक मजाक है।

इसलिए राहुल गांधी को चुनाव हराना काफी नहीं है। असली राष्ट्रीय कर्तव्य उनकी पूरी राजनीति को जड से खत्म करना है। क्योंकि अगर हम भारत को नागरिक, एक बार भी गलती करते हैं, तो वह भारत को उसी गुलामी में डाल देंगे जो हमारे पूर्वजों ने सदियों तक झेली।

राहुल गांधी सिर्फ एक हारने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि भारत विरोधी ताकतों का एक जहरीला औजार हौ। 


मेरी टिप्पणीः आज के दिन भाजपा जैसी अपने आपको असुरक्षित समझने वाली और हठिली पार्टी कोई नहीं होगी. विडीयो में यह सब चुनावों की पृष्ठभूमि में ऐसे हथकंडे करने में भाजपा लाचार है.

मैं धोखेबाज सेक्युलरिज्मकी नुमाईंदगी करना चाहने वालों में से हूँ और यहां पर मेंने बाजी पलटने का मौका पाया है.

मेरे हिसाब से मुहम्मद गौरी की जितनी तुलना प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से की जा सकती है  उतनी तुलना राहुल गांधी से नहीं की जा सकती; जहां तक लोकतांत्रिक रवैयों की बात की जाय.

मुहम्मद गौरी के ज़माने में प्रजातंत्र प्रणाली थी ही नहीं कि जाना जाय कि वह कितना लोकतांत्रिक था.  उस वक़्त राजा और राजा की भीड़ हुई, तलवार निकली, कि जो जीता वह सिकंदर.  प्रजा सो कोई लेना देना नहीं. राजा बदलता, प्रजा वहीं के वहीं रहती. यह तो अंग्रेजों ने आकर गुल खिलाया, इस में प्रजा को भी पिरोया गया,  और मच गई प्रजा में तबाही ही तबाही.

लेकिन हर एक की बात एक सी है।  हर एक का एजेंडा एक ही है। यानीकि भारत पर चढ़ाई करना! सिद्धांत सब का एक. फारसी भाषा पर काबू रखने वाले गौरी को गैर फार्सी पर धावा क्यों बोलना चाहा?  वैसे ही गैर हिंदी श्री नरेंद्र मोदी को हिंदी भाषीयों से क्या लेना देना होना चाहिए?  राहूल गांधी और उन्के टुकड़े-टुकड़े करने वाले गैंग भी ऐसा कुछ नहीं कहते की देश को सही पैमाने पर आज़ाद करवाना चाहते हैं।  सब का ही तो यही फैसला है कि अंग्रेजों से आज़ादी यानि की आज़ादी.

लेकिन अंग्रेज हो या तो मुहम्मद गौरी, उनकी जितनी तारीफ की जाय इतनी कम है. दूरदराज़ समुद्रपार या वेरान रेगिस्तान से बिलकुल अनजान एलाके में आ कर चढ़ाई करना और अपने ताबे में लाना वह कतई आसान काम नहीं.  और यहां पर बैठे बैठे चढ़ाई करने का खेल श्री नरेंद्र मोदी और श्री रारुल गांधी मशगुल होते हुए हैं.

हां, पर इस लेख लिखने वाले, विडीयो बनाने वाले  संजीव दुबे ने तारीफ तो कर ही डाली यह कह कर कि सबसे काले पन्नों से मुहम्मद गौरी की याद आती है..., और राहुल गांधी की विदेशी ताकत भारत को उसी अंधेरे में धकेल कर  भारत को उसी गुलामी में डाल देंगे जो हमारे पूर्वज ने सदियों तक झेली।

एकटेदुकटे लोग जो भारतीयों के सेंकड़ो को सदियों तक गुलामी में रखने में कामयाब रहे उसे में से ही भारतीयों का कथाकठित 5000 वर्ष पुरानी संस्कृतिका प्रमाण अपने आप उभर कर सामने आता है। यहां पर भाजप का असुर्क्षित होना, हठिली होने का कारण खुदबेखूद सामने आ जा रहा है.

एक तो दूर दराज़ से आना, न कोई स्थानीय भाषा का जानना,  भाषा सिखना और न सिर्फ सिखना अपनी भाषा सिखाना.  और इतनी सिखाना कि सारे देश की अधिकृत भाषा ही वह हो सके. और नहीं तो और इतनी सिखी-सिखाई जाय कि कुछ लोग उसे अपनी ही भाषा समझने लगे.  फारसी भाषा को लादना वह अपने आपकी अदभूत बात थी.  अंग्रेजी आई और आज भारत उसी भाषा पर टिका हुआ है चाहे आप अपने आप स्वतंत्र समझो या गुलाम.  जीत तो आखिर में बाहर की संकृती ही की हुई है.

फारसीओंने, अंग्रेजीओंने बानबनाए शहर, इमारतें, रास्ते के नामों बदल ने का काम अनैतिक कमों में विश्वास रखने वाले ही कर सकते हैं, कमज़ोर रही  सस्कृति ही करा सकती है.

श्री भागवद गीता दो हिस्सों में बटा है। एक है अर्जुन का हिस्सा, दुसरा श्री कृष्ण का हिस्सा.  महात्मा गांधी हो या कोई और, भारतीय संस्कृति सिर्फ अर्जुन तक ही सिमीत रख पाती है।  ‘मन की बात अर्जुन की इच्छाओं को दरशाता है. चाहे कितना ही राम मंदीर बनाया याद, पूजा, अर्चना, पाठ किया जाय, वह खाना, यह खाने पर परहेज़, व्रत रखें जाय, बाज़ी सारी विदेशियों के पक्ष में चले जाने की संभावना हमेशा रही है।

यही कुछ जवाब दे रही है कि भाजपा के लिए असुरक्षित सा माहोल क्यों सदा के लिए बना रहा है।  राहुल गांधी का चेहरा उनके लिए क्यों डरावना सा लगता रहता हैशायद वह समझ चुकें हैं कि श्री राम पर मात किया जा सकता है, पर श्री कृष्ण की कुछ और ही सोच रहती है.

यह तो सब बात करने की बात है.

4:33 p.m. 31-05-2026 


मंगलवार, 2 जून 2026

ग्रेटर बांग्लादेश

 Greater Bangladesh

मेरी टिपण्णी (पश्चिम) बंगाल को भारत से अलग करने का जो ग्रेटर बांग्लादेश वाला बनाने का मास्टर प्लान तैयार था उस पर भारत के आम वोटरसोने के ऐसी करारी चोट दी है कि आज सुपरपावरों के पसीने छूट रहें है’ 

ऐसा विचार इस विडीयो में पाया गया है।

मैं कहूं के यह तो बहुत अच्छी बात है कि ग्रेटर बांग्लादेश वजुद में आए.  विभाजन का असली मार पंजाब और बांग्ला पर हुआ.  पंजाब तैयार था, और बंगाल तैयार था, एक रहने के लिए लेकीन उस वक़्त के स्वतंत्रता सेनानी को ग्रेटर भारत की खोज थी.

मंमता बेनर्जी का रवैया कतई बांग्लादेश से हात मिलाने का नहीं रहा है.  हां, ऐसा कह सकतें हैं की सामनी ओर से मतदाता मिल जाने का उन्हें नागवारा नहीं होता होगा.

पश्चिम जर्मनी और पुर्वी जर्मनी एक हो गएंइसी तरह पश्चिम बेंगाल और पुर्व बेंगाल क्यों न एक हो जायहा, खूद एक होने चाहते हैं या नहीं यह एक बात रही, पर जो गैर बेंगाली है उनका क्या हक कि ऐसा न होने देने का?  

सब से बड़ा अपराध नेहरू के पक्ष में जाता है क्योंकि अंग्रेज से लूटी हुई अमानत में से कलकत्ता हट जाना उनको गवारा नहीं था।

4:55 p.m. 31-05-2026 

मंगलवार, 19 मई 2026

नाम बदलने की पहेली

सड़क के उस पार रहने वाले मेरे पड़ोसी, जिनसे मुझे रोज़ सुबह मिलने का मौका मिलता है, मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्हें 'लाम रोड' का नाम बदलने के बारे में पता चला। अब इस सड़क का नाम होगा: छत्रपति शिवाजी महाराज मार्ग (CSMM)

 मैंने उनसे कहा कि नाम बदलने की इन गतिविधियों में एक तय प्रक्रिया होनी चाहिए। वह प्रक्रिया यह है कि जनता से पूछा जाए कि क्या वे नाम बदलना चाहते हैं या पसंद करेंगे या नहीं। ज़्यादातर मामलों में, जवाब 'नहीं' ही होगा। आप किसी जगह के नाम को उसकी पहचान से जोड़ लेते हैं और उसे एक तय और अंतिम चीज़ मान लेते हैं। नाम बदलने का मतलब है पहचान बनाने की प्रक्रिया को फिर से शुरू करना। यह कुछ ऐसा लगता है, जैसे अचानक आपके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई हो।

 ऊपर बताई गई प्रक्रिया का पालन किए बिना ही 'लाम रोड' का नाम बदल दिया गया, और उन्होंने 'शिवाजी महाराज' के नाम की आड़ लेकर सुरक्षित रास्ता चुनाएक ऐसा नाम जो लोगों के दिल में सबसे महान मकाम रखता है और जिस पर कोई भी आपत्ति करने की हिम्मत नहीं कर सकता। हालाँकि, शिवाजी महाराज का 'देवलाली कैंप' से,  दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं हुआ होगा। मैंने अपने पड़ोसी से कहा कि किसी सिंधी व्यक्ति को भी यह सम्मान दिया जा सकता था। सिंधियों ने देवलाली कैंप के विकास में बहुत योगदान दिया है, और उनका कोई एक नाम आसानी से इस सड़क के लिए चुना जा सकता था।

 पड़ोसी ने मुख्य रूप से दो नामों का ज़िक्र किया, जिनका समाज-सेवा से गहरा नाता था। इनमें से एक है श्री वासु श्रॉफ, जिनका हाल ही में निधन हुआ है;  और दूसरे थे एक गैर-सिंधीएक पंजाबीमहाराज कृष्ण बिरमानी। उन्होंने आगे बताया कि श्री वासु श्रॉफ हमेशा अपने कामों का श्रेय लेने के इच्छुक रहते थे, जबकि श्री बिरमानी ने हमेशा बिना किसी दिखावे के उदारता दिखाई है।

 अचानक, जब मैंने श्री महाराज बिरमानी का नाम सुना, तो मेरी आँखों में एक चमक आ गई। मुझे पूरा यकीन है कि जो कोई भी उनसे जुड़ा  होगा, वह इस संभावना को सुनकर उसकी आंखो में भी चमक सी आ जाएगी। वैसे भी, दोनों नामों में 'महाराज' शब्द तो साझा है ही; इसके अलावा, अगर इस सड़क का नाम 'महाराज कृष्ण बिरमानी मार्ग' (MKBM) रखा जाता, तो इसमें स्थानीयता का पुट और भी गहरा अर्थ जुड़ जाता।  मैं यह बात, नाम बदलने की किसी भी प्रक्रिया के प्रति अपनी घोर नापसंदगी के बावजूद कह रहा हूँ।

 गहराई से सोचने पर यही लगता है कि आजकल हर जगह बस शिवाजी महाराज के नाम का ही जाप किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, एक शर्ट के बटन का नाम आसानी से 'छत्रपति शिवाजी महाराज बटन 1', 'छत्रपति शिवाजी महाराज बटन 2' आदि रखा जा सकता है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि बटनों, सड़कों और बगीचों के नाम तो इस मराठा आदर्श के नाम पर रखे जाते हैं, लेकिन खुद शर्ट का नाम, खुद शहर का नाम या खुद ज़िले का नाम नहीं हुआ है। इस मामले में, उनके बेटे संभाजी महाराज के नाम ने बाज़ी मारी ली है

 ऊपर बताई गई प्रक्रिया के बारे में सोचिएयानी जनता से यह पूछना कि क्या नाम बदलने की ज़रूरत हैअगर यह प्रक्रिया अपनाई जाती, तो औरंगाबाद को उसकी ऐतिहासिक जगह से हटाना इतना आसान नहीं होता। अब, जब वह प्रक्रिया लागू नहीं है और छत्रपति संभाजी महाराज का नाम आगे आ गया है, तो औरंगाबाद के लिए यह खेल खत्म जैसा है। 'छत्रपति संभाजी महाराज नगर' (CSMN) नाम ने उन सभी जगहों से औरंगाबाद का नाम हटा दिया है, जहाँ पहले औरंगाबाद का ही बोलबाला था। यानी हर जगहचाहे वह ज़िले का नाम हो या शहर का। शिवाजी महाराज के बेटे को यह दर्जा सिर्फ़ इसलिए मिला है, क्योंकि मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने उन्हें बेरहमी से यातनाएँ देकर मार डाला था।

 भारतीय हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवताओं में भगवान गणेश को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है; और ऐसा सिर्फ़ इसलिए है, क्योंकि उनका अपने पिता के साथ एक ऐसा टकराव हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें हाथी का सिर धारण करना पड़ा था।

 जैसा कि अक्सर होता है, देवलाली छावनी के हर अंग्रेज़ी नाम को चुन-चुनकर हटा दिया गया है। यहाँ तक कि अब बंद हो चुका कैथे सिनेमा को भी इस तरह के इस्तेमाल से नहीं बख्शा गया है। 

कहा जाता है कि 'लाम रोड' का 'लाम' किसी पारसी व्यक्ति का नाम पर था। श्री एम. के. बिरमानी की फ़ैक्टरी के एक हिस्से पर "J. N. Lam, Prospect Lodge, 1919" लिखा हुआ हैजो इतिहास का एक दिलचस्प हिस्सा है।

 यह सारी हलचल उस इतिहास के प्रति एक तरह की बगावत है, जिसे नियति या ईश्वर की मर्ज़ी ने रचा होता है। यह उस 'विश्व एक परिवार है' की अवधारणा के बिल्कुल विपरीत है, जिसका ज़िक्र हमारे धर्मग्रंथों में भी मिलता है।

 जीवन के हर पहलू की सराहना की जानी चाहिए। इसका मतलब कतई नहीं होता  कि हम जीवन के किसी खास हिस्से को किनारा कर दें और सिर्फ़ राष्ट्रवाद के नाम पर उससे नफ़रत करने लगें। यह उस राष्ट्रवाद की बात है, जो 'भारत' नामक एक ऐसे राष्ट्र के लिए हैजो अपने आप में एक इंसानी बनावट ही है, और जिसके जाल में हमारे सभी राष्ट्रीय नेता खुशी-खुशी फँसना चाहते हैं।

भारतीय राष्ट्रवाद का अर्थ है एक  ज़बरदस्ती की एकता एक बाजु और दूसरी ओर एक ज़ोरदार तमाचा विविधता के ऊपर!!

 


शिवानंद इलेक्ट्रॉनिक्स IPL परिसर में ऐतिहासिक प्रतिबंब

19-05-2026


टिप्पणी_2: नाम बदलने के इस सिलसिले की शुरुआत कहाँ से हुई, यह समझना काफी आसान है। इसकी जड़ें मोदी सरकार के इस जुनून में छिपी हैं कि वे पिछली ब्रिटिश हुकूमत को मिलने वाले श्रेय को कितना कम कर सकते हैं। भारत का हर कोना, हर हिस्सा किसी न किसी हद तक ब्रिटिश राज का ही ऋणी है; और ऐसे में, यह ज़रूरी हो गया है कि इन जगहों के नाम बदल दिए जाएँ। साथ ही, ताकि स्थानीय नायकों को लेकर कोई भ्रम न पैदा हो, केवल उस दौर के 'राष्ट्रवादी' नायकों को ही वह प्रमुखता दी जाती है, जिसके वे अक्सर हकदार माने जाते हैं।

इससे यह एहसास होता है कि भारत एक 'लूटी हुई संपत्ति' है। और इस कड़वी सच्चाई को छिपाने के लिए ही, नाम बदलने का यह सिलसिला इतना ज़रूरी बन गया है।

ब्रिटिश राज का अंत उन लोगों के लिए सबसे अहम पल साबित हुआ, जो उस 'संपत्ति' पर अपना कब्ज़ा बनाए रखना चाहते थे, लेकिन साथ ही यह भी नहीं चाहते थे कि इसका श्रेय किसी और को मिले।

अगर ब्रिटिश राज द्वारा स्थापित तंत्र और देश के कोने-कोने तक फैली व्यवस्था न होती, तो आज का भारत शायद कुछ और ही होता। तब शायद पंजाब में 'हिंदू-मुस्लिम' की पहचान से ज़्यादा 'पंजाबी' पहचान हावी होती; सिंध में भी 'हिंदू-मुस्लिम' या 'भारतीय-पाकिस्तानी' होने के बजाय 'सिंधी' पहचान ज़्यादा प्रमुख होती। और यह बात, यकीनन, किसी को भी मंज़ूर नहीं होती! यह न सिर्फ़ आज की BJP के लिए, बल्कि देश की तमाम 'राष्ट्रीय' पार्टियों के लिए एक घोर अस्वीकार्य स्थिति होती।

तो बात कुछ ऐसी है: भारत और पाकिस्तान का यह अस्तित्व और उनके बीच की यह पुरानी रंजिश, दोनों ही बनी रहेंयही बेहतर है। लेकिन ज़रा सावधान रहें: दूसरे पक्ष की तारीफ़ भूलकर भी न करें। बल्कि, उनके तमाम प्रतीकात्मक निशानों को पूरी तरह से मिटा दें।

 21-05-2021



टिप्पणी 3: BJP के लिए—एक हिंदू धार्मिक सोच वाली BJP के लिए—यह बात और भी ज़्यादा अस्वीकार्य है कि वह इसका श्रेय एकदम बाहरी लोगों को दे, ऐसे लोगों को जो खुलेआम गोमांस खाते हैं। वे भगवान को इस बात के लिए बिल्कुल माफ़ नहीं कर सकते कि उन्होंने भारत को ऐसी स्थिति में डाल दिया, जबकि यहाँ के लोग इतने ज़्यादा धार्मिक विचारों वाले हैं। इसलिए, ज़ाहिर तौर पर धार्मिक जोश से भरकर ही उन्होंने नामों को मिटाने का यह काम शुरू किया है। नतीजतन, हालात उससे कहीं ज़्यादा बुरे हो गए हैं जितने कि वे अन्यथा हो सकते थे।

इसलिए, आपके पास हार मान लेने के अलावा कोई चारा नहीं है। यहाँ तक कि भगवान भी इसमें आपकी मदद नहीं कर सकते।



टिप्पणी 4: पूरी दुनिया में धर्म ही हर चीज़ को परिभाषित करते हैं। इज़राइल, भारत-पाकिस्तान—इन सभी का अस्तित्व धर्म की ही देन है। चाहे कितनी भी मुसीबतें आई हों, या लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा हो। ये सब वहाँ इसलिए मौजूद हैं ताकि वे भगवान और तर्क-बुद्धि के विपरीत काम कर सकें।

24-05-2026

मंगलवार, 31 मार्च 2026

जय श्रीराम का देश 85वें स्तर पर!!

Sarita/editorial

सरिता प्रवाह, संपादकीय

जनवरी, द्वीतीय, 2026

भारतीय पासपोर्ट

पिछले साल के मुकाबले भारतीय पासपोर्ट की पौवर यानी कितने देश बिना वीजा के भारतीय पासपोर्टधारकों को अपने देश में घुसने देते हैं, 5 स्तर कम हो कर अब 85वें स्तर पर है. दुनिया के 196 देशों में से केवल 57 देश भारतीय नागरिकों को सुरक्षित समझते हैं जहां वीजा की जरूरत नहीं है......



मेरी टिप्पणी हमने आज का अपना देश अंग्रेजों से पाया. अंग्रेजों तो अतिअल्पसंख्यक थे। उन्हीं की छोड़ी खाली जगहों पर हमारे, उन्ही की बदौलत बने नेते, गांधी, नेहरू, अंबेडकर... सारे उन्ही की बदौलत थे, अपना योगदान करने लगें. अंग्रेज अतिअल्पसंख्यक थे तो भारतीय नेताओं को भी इसी हैसियत हासिल हुई.  यहां पर नेताओं को कोई गिला शिक्वा नहीं है. वे अपने खुशी खुशी नियुक्त होते हैं और सारी सहुलियत पाते हैं.  जब चाहे अपनी आमदनी बड़ाचढा कर बटोर रहें हैं. जितना बड़ा देश, इतनाही बड़ा समुद्र, लूटने के लिए समुद्र!

भारत का अहम मतलब ही यह होता है कि एक बाजू अतिअल्पसंख्यक नेते  और दूसरी और ढेर सारी प्रजा जिनकी हालात बदले न बदले कुछ फरक नहीं पड़ता. उलटा यह कह सकतें हैं कि अंग्रेजों से आज़ादी का तो जाने उन्हें फटका सा ही बैठा, यानि कि बहुत सारे को. जो बेंगाल से ताअलूक रखते थें, सिन्ध, पंजाब, पेशावर से ताअलूक रखते थें. उन्हें.  लहू के रंग गांधी के हात से निकले नहीं निकलेंगे. उन्हों ने जयश्री राम के नारे ज्यादा ही लगायें.

लेकिन, हां, आज के वक़्त तक नेताओं का बोलबाला जारी रहा है. साथ साथ में और लोगों के और क्षेत्रों मे दर्जा पाने वालें का. यहां भी अतिअप्लसंख्यक को ही प्राधान्य है. चाहे कितना  भी करो, आपका चुनाव भारतीय टीममें 140 करोड़ में से ही होना है.  हा एक बार चून लिए गए तो माल ही माल है, जैसे नेताओं के पास सम्मिलित हो पाता है.

इस अतिअल्पसंख्यक दुनिया को ही तवज्जू दें तो भारत कहीं बेहतर अंक हासिल कर सकता है लेकिल बाहरी देसों के लोगों को, परिक्षित करने वालें लोगों को,  नेताओं के खंदे के पीछे भी झांकने की बूरी आदत बनी हुई है. महा अफसोस!

5.49 p.m. 31-03-2026


शनिवार, 21 मार्च 2026

भारत यानी कि कौरवस्थान

  Lokmat Times _20260226

Rajaji’s bust

Replacing Lutyens’ bust with that of Rajaji signals a shift in cultural decolonisation


मेरी टिप्पणी आप यह दावा करते हैं कि "एडविन लुटियंस की जगह सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय प्रतीकात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है।

मेरी राय में, इसी तर्क के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि, हाल ही में, 'औरंगाबाद' शहर के सदियों पुराने और प्रसिद्ध नाम की जगह 'छत्रपति संभाजीनगर' नाम रखे जाने की घटना का ही एक प्रतिबिंब है।

 मेरे विचार में, इसका अर्थ यह है कि इतिहास की पवित्रता को भारी बूटों तले रौंदा जा रहा है। इसके अलावा, आपकी लिखी बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि आप इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने को एक वांछनीय और सुविधाजनक कार्य मानते हैं। 

आप लिखते हैं: "यह भारत के सार्वजनिक स्थलोंविशेषकर उन स्थलों को जो औपनिवेशिक सत्ता से जुड़े हैंको इस प्रकार पुनर्गठित करने का एक सचेत प्रयास है, ताकि वे राष्ट्र की अपनी सभ्यता और राजनीतिक यात्रा को प्रतिबिंबित कर सकें।"

 मेरी राय में, सी. राजगोपालाचारीऔर वास्तव में उस युग के प्रत्येक व्यक्तिपर उसी औपनिवेशिक सत्ता का ऋण थे; ठीक वही सत्ता थी जिसने उन्हें गढ़ा और उन्हें अस्तित्व में लाये। जब आप अपनी सामूहिक स्मृति से उसी औपनिवेशिक सत्ता को मिटाने का प्रयास कर रहे हैं, तो आप वास्तव में "राष्ट्र की अपनी संस्कृति और राजनीतिक यात्रा" की बात किस संदर्भ में कर रहे हैं? आप इसे पसंद करें या न करें, उस औपनिवेशिक सत्ता की विरासत उस नींव का एक अभिन्न अंग बना हुआ है, जिस पर आज तक यह राष्ट्र खड़ा है!

 इस नींव को हिलाया नहीं जा सकता। बेशक, यह तभी संभव है जब कि आप इस अफसोसनाक  बात से डटे रहेंगे।यानी कि 'भारत के विचार'  के प्रति सच्चे बने रहेंगे! 

आप कहते हैं कि "उनकी (लुटियंस की) प्रतिमा को हटाकर उसकी जगह राजाजी की प्रतिमा लगाना प्रेरणा के स्रोत में आए एक बदलाव का संकेत है।" इसका निहितार्थ यह है कि प्रेरणा का स्रोत 'गुरु'—यानी मूल निर्मातासे हटकर 'शिष्य'—यानी अनुकरणकर्ताकी ओर स्थानांतरित किया गया है। इसके भीतर एक परेशान करने वाला विचार छिपा है: वह यह कि, भारत अपनी स्थापना के समय से ही, हमारी अपनी ही रचना थीऔर केवल इस दावे को सही साबित करने के लिए, हम अपनी प्राथमिकताओं को बदलने और अपनी प्रेरणा के मूल स्रोतों को ही स्थानांतरित करने के लिए विवश हैं। आपकी दृष्टि में, स्मारक के आधार पर स्थित सारे  क्षेत्र को किसी भी बाहरी या अशुभ तत्व से तत्काल मुक्त कर दिया जाना चाहिए। 

यद्यपि स्मारक के परिवेश को बाहरी सत्ताओं के प्रतीकों से मुक्त किया जा सकता है, परंतु जिस चीज़ को बदला नहीं जा सकता, वह स्वयं उसकी नींव हैएक ऐसी रचना जिसका श्रेय सीधे तौर पर लुटियंस को जाता है, जिन्होंने इसकी स्थापना में एक निर्णायक भूमिका निभाई थी। इसके अलावा, भले ही उनकी प्रतिमा को हटाना एक आसान काम हो, लेकिन लुटियंस की मातृभाषायानी कि अंग्रेज़ीके बारे में आपका क्या रुख है? आज के भारत में, इसकी मौजूदगी बिल्कुल अटल बनी हुई है! आप आखिर कितने लोगों को, और किस हद तक, भ्रम में रखने का इरादा रखते हैं?

फिर भीआप चाहे कितनी भी निराशा क्यों न महसूस करें, और भले ही आपने सिर्फ़ भाषा का नाम बदलकर ही तसल्ली पाने की कोशिश करना चाहेकुछ मामलों को पहले ही एक 'नेक' तरीके से सुलझा लिया गया है! कहने का मतलब यह है कि अंग्रेज़ी भाषा के लागू शहरों के नाम जैसे बोम्बे, मद्रास और कलकत्ता जैसे नामों का इस्तेमाल काफ़ी समय पहले ही बंद कर दिया गया है।  हालाँकि आप अंग्रेज़ों को एक नकारात्मक नज़रिए से देखना 'नेक' मानते हैं, लेकिन ऐसा करके, आप इन नामों के विनाशया यूँ कहें, 'हत्या'—में एक ज़रिया बन गए हैं, जिसका असर आपकी अपनी दुनिया और दूसरों की दुनिया, दोनों पर पड़ा है।

आप यह मानते हैं कि "लुटियंस निस्संदेह एक शानदार वास्तुकार थे, जिनकी छाप राष्ट्रपति भवन और शाही राजधानी नई दिल्ली पर आज भी साफ़ दिखाई देती है।" फिर भी, आप आगे लिखते हैं: "इसके बावजूद, उनका काम एक ऐसे साम्राज्य का प्रतीक था जिसने बिना किसी लोकतांत्रिक सहमति के भारत पर राज किया।"

 मेरी राय में, यह बयान तकनीकी रूप से सही नहीं है। सौ लोगों के मुकाबले पाँच लोगों के अनुपात को "लोकतांत्रिक सहमति" की कमी के तौर पर कैसे देखा जा सकता है? ऐसा दावा किसी भी तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। वे पाँच लोग, जिन सौ लोगों का सामना कर रहे थे, उनकी मौन सहमति के बिना वे भला कैसे काम कर सकते थें? यह स्थिति हमें पांडवों और कौरवों के बीच हुए महाकाव्य युद्ध में पाँच और सौ के अनुपात की पौराणिक मिसाल की याद दिलाती है। एक तरफ़ हैं नेक, गुणी और दयालु पांडव; तो दूसरी तरफ़बिल्कुल विपरीत दिशा मेंहैं कौरव।

अफ़गानिस्तान में, उनके 'कौरव'  बुद्ध की प्रतिमाओं को बर्दाश्त नहीं कर पाए। उन्होंने बामियान क्षेत्र के पहाड़ों को काटकर बनाई गई बुद्ध की विशाल प्रतिमाओं को बम से उड़ा दिये। भारत में भी, हमें ठीक यही 'कौरव' वाली प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। इससे यह साबित होता है कि इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने की इस आदत में अफघानिस्तान  अकेला नहीं है!

अगर कोई सचमुच 'कौरव' है, तो उसके लिए कुछ और होना नामुमकिन है। यहाँ, जाति व्यवस्था के तर्क को अपना सिर उठाने का मौका मिल जाता है। जाति व्यवस्था कुछ खास व्यक्तिगत लक्षण तय करती है; यह इस बात पर ज़ोर देती है कि किसी व्यक्ति को पूरी तरह से अपनी जन्मजात प्रकृति के अनुसार जीने का अधिकार है। इस संदर्भ में, कोई भी ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की सोच को याद कर सकता है। उनके मन में भारतीयों के प्रति गहरा पूर्वाग्रह था; उनका मानना ​​था कि भारतीय "या तो ऐसे होते हैं या वैसे"जिसका मतलब यह था कि उनका नैतिक पैमाना पूरी तरह से एक अलग ही धरातल पर काम करता है!

क्रिकेट के खेल पर ही गौर कीजिए! यह मूल रूप से अंग्रेज़ों का खेल है। एक बार फिर, हम इस खेल की जड़ों में बहुत गहराई तक जाने से कतराते हैंक्योंकि 'कौरवों' का आक्रामक मिज़ाज इस तरह की बारीकी से जाँच-पड़ताल को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। जिस तरह अंग्रेज़ी भाषा हर जगह फैल गई है, ठीक उसी तरह क्रिकेट का खेल भी हर जगह पहुँच गया है। भारत के लिए, अंग्रेज़ी भाषा और क्रिकेट का खेल भारत से इस कदर जुड़े हुए हैं कि इन्हें  अलग करना बेहद मुश्किल हो गया है।

 जब यह बात तो तय हो गई समझो कि कौरव बने रहेंगे, १०० विरुद्ध ५ के पैमाने वाला भारत रखा रहेगा,   हम पाएँगे कि हमें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि हम किसके खिलाफ खेल रहे हैंचाहे वह छोटा सा न्यूज़ीलैंड हो, नन्हा सा इंग्लैंड हो, या फिर वेस्ट इंडीज़; इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। यहाँ, 'कौरवों' का दबदबा दुनिया के बाकी हिस्सों में 'पांडवों' के दबदबे से कहीं ज़्यादा भारी पड़ना होगा! हमारी दुनिया की जन्मजात दुष्टता, बाहरी दुनिया की मासूमियत के ठीक विपरीत खड़ी है। और लंबे समय तक, 'कौरव' कभी भी 'बॉस' नहीं बन पाए थेजैसा कि वे आज बन पा रहे हैं। अब सब ठीक है। चीजें उनके तरफसे  काम कर रही हैं,  १०० से ५ का भाज्य उनके तरफ से परिणाम दे रहा है। लेकिन १५० करोड़ आबादी में से चुने गये सिर्फ १० खिलाड़ी कितनी असमानता पैदा कर रही है! यहां तो आम लोगों से इंसाफ कोसो दूर रखा गया है, इरादे से, 'भारतमाता की जय' की पुकार के कारण!

11ः22 सांय, 17-03-2026


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लोकमत टाईम्स का संपादकीय

राजाजी का बस्ट

लुटियंस के बस्ट की जगह राजाजी का बस्ट लगाना कल्चरल डीकोलोनाइजेशन में बदलाव का संकेत है

 राजाजी

एडविन लुटियंस के बस्ट की जगह सी राजगोपालाचारी का बस्ट लगाने का फैसला बहुत सारे सिंबॉलिज्म वाला है और इसके कई पॉलिटिकल मतलब भी हैं। एक लेवल परयह भारत की पब्लिक जगहोंखासकर इंपीरियल पावर से जुड़ी जगहों कोदेश की अपनी सिविलाइजेशनल और पॉलिटिकल जर्नी को दिखाने के लिए फिर से बनाने की एक सोची-समझी कोशिश को दिखाता है। दूसरी तरफयह टाइमिंग और इरादे पर ज़रूर सवाल खड़े करता हैखासकर जब तमिलनाडु में चुनावी माहौल ज़ोर पकड़ रहा है। लुटियंस बेशक एक मास्टर आर्किटेक्ट थे जिनकी राष्ट्रपति भवन और इंपीरियल कैपिटल नई दिल्ली पर छाप को नकारा नहीं जा सकता। फिर भीउनका काम एक ऐसे एम्पायर का प्रतीक था जो बिना डेमोक्रेटिक सहमति के भारत पर राज करता था। उनके बस्ट की जगह राजाजी का बस्ट लगाना इस बात पर ज़ोर देने में बदलाव का संकेत है। यह एक साइकोलॉजिकल और कल्चरल डीकोलोनाइजेशन को दिखाता हैजो नागरिकों को याद दिलाता है कि भारतीय डेमोक्रेसी की लेजिटिमेसी कॉलोनियल विरासत से नहीं बल्कि अपने नेताओं के बलिदान और विज़न से आती है।

राजाजी का रुतबा ऐसी पहचान को सही ठहराता है। भारत के आखिरी गवर्नर जनरल और उस पद पर रहने वाले अकेले भारतीय के तौर परउन्होंने उस पल को दिखाया जब कॉलोनियल अथॉरिटी ने ऑफिशियली नेशनल सॉवरेनिटी को सौंप दिया था। उनका रोल सिर्फ रस्मी नहीं थाबल्कि यह भारत के गुलामी से सेल्फ-गवर्नेंस में बदलाव के पूरा होने का इशारा था। इसके अलावास्वतंत्र पार्टी की स्थापना ने उनके समय की हावी सोशलिस्ट आम राय का विरोध करने में उनकी इंटेलेक्चुअल इंडिपेंडेंस और हिम्मत को दिखाया। वह एक ऐसे खास स्टेट्समैन थे जिन्होंने पॉपुलैरिटी से ऊपर उसूलों को रखाबहुत ज़्यादा स्टेट कंट्रोल के खिलाफ चेतावनी दी और ऐसे विचारों के मेनस्ट्रीम बनने से बहुत पहले ही इंडिविजुअल फ्रीडम की वकालत की। इस तरहराजाजी को सम्मान देने से पब्लिक मेमोरी में इम्बैलेंस ठीक होता है। यह एक ऐसे लीडर की इज्ज़त वापस लाता है जिसका योगदान बुनियादी थाफिर भी नेशनल नैरेटिव में अक्सर उसे कम आंका गया। डीकॉलोनाइजेशन सिर्फ विदेशी सिंबल को हटाने के बारे में नहीं हैबल्कि भारत की डेमोक्रेटिक और फिलॉसॉफिकल विरासत को दिखाने वाले देसी सिंबल को पॉजिटिव तरीके से स्थापित करने के बारे में है।

फिर भीपॉलिटिकल कॉन्टेक्स्ट को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। सरकार का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब तमिलनाडु का पॉलिटिकल माहौल एक बार फिर उतार-चढ़ाव में है। राजाजीएक बड़े तमिल बुद्धिजीवी और राष्ट्रवादीराज्य में अलग-अलग विचारधाराओं के लोगों के बीच बहुत सम्मान पाते हैं। उन्हें इस तरह पहचान देना तमिल गर्व और भावनाओं से जुड़ने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता हैखासकर ऐसे इलाके में जहां नेशनल पार्टियों को अपनी जगह बनाने के लिए पहले से ही संघर्ष करना पड़ा है। यह दोहरापन ज़रूरी नहीं कि इस काम को सही ठहराए। राजनीतिक फैसलों में अक्सर सिंबॉलिक अच्छाई और चुनावी हिसाब-किताब दोनों होते हैं। आखिर में यह मायने रखता है कि क्या ऐसे इशारे भारत के अतीत की गहरी और ज़्यादा सबको साथ लेकर चलने वाली समझ में मदद करते हैं।

(गुगल ट्रांस्लेट से किया गया अनुवाद)