Lokmat Times_20250428
खून खौल रहा है, अबकी बार हो आरपार!
जनरल मुनीर के नफरती बयान से साफ हो गया
था कि ये शख्स कश्मीर के लिए षड्यंत्र रच रहा है
डॉ. विजय दर्डा, चेरमैन, एडिटोरियल बोर्ड,
लोकमत समूह
ये मजहबी जंग बिल्कुल नहीं है, ये नरपिशाचों का
खूनी कृत्य है. इसे खत्म करना होगा.
मेरी टिप्पणी – ऐसा कहा गया है कि जब आप बंदर पर हथियार से प्रहार
करते हैं तो वह हथियार को दोष देता है, हत्यारा को नहीं. यहां पर उससे बिल्कुल विपरीत, हथियार कौन, हत्यारा कौन, इन पर नजर डाली जाय न डाली जाय, सीधा जनरल मुनीर की कमीज़ का ही कोलर पकड़ा गया
है. दोनो चीज़ों से आसानी बरतती है. एक बाजू सिर्फ
हथियार का दोषी पाया जाना, दूसरी तरफ दूर बैठे बस एक पाकिस्तानी जनरल मुनीर
को जिम्मेदार ठहराना. सही में होंशियारी देखें तो जिम्मेदर तो सिर्फ
उपरवाला ही बनता है. खास कर के जहां मौत शामिल हो, वहां तो खैर उपरवाले कि ही मर्जी समझी जाती है.
खैर उपरवाले को कौन पूछे? पूछे तो ठीक उसके नीचे जो है श्री मुनीर. एक बाजू ठहरे राजा मुनीर और दूसरी बाजू है ठहरे
राजा श्री मोदी. यहां पर राजा़ओं के बीच का मामला है, प्रजा का नहीं, यह सिद्ध है. शुरु में एक राजा ने ही तो अपनी दुम
बचाकर जम्मू-कश्मीर को भारत के राजा नेहरु को सौंप दिया था.
आखीर में इंडिया-पाकिस्तान कैसे बने? दोनों ही अंग्रेज़ साम्राज्य की देन है.
साम्राज्यवाद इनकी बुनियाद है. यानी कि राजाओं का मामला है. असली जो राजाओं थे, जो जन्मजात राजाओं थे, उनकी रियासतों को अंग्रेजों ने यूं ही जारी रखें
थें. अंग्रेजों से आज़ादी के बाद उन को बेदखल कर दीये गये क्योंकि राजाओं की क्या
हेसियत रही जब प्रजा को ही राजा बनने का मौका मिल गया हो!
अभी तो सब राजा बनकर चले हैं. चाहे मुनीर हो, मोदी हो कि इस लेख लिखने वाले श्री दर्डा. श्री दर्डा ने कहा, जो कई बार सुनाया गया है – ‘कश्मीर भारत का हिस्सा था, है और रहेगा’. यानी कि कश्मीर भारत के कब्ज़े में था, कब्ज़े में है और कब्ज़े में रहेगा. यह सब राजाओं
के मुंह से सुनना अच्छा लगता है, जिन का युग शायद सारी दुनिया से रुखसत हो गया है. एक भारत-पाकिस्तान हैं जहां प्रजा को राजा बनने का मौका मिलता है और इस
उपलब्धी को कौन छोड़ना चाहेगा?
है कोई एमएले, एमपी जो रातोरात करोड़पती नहीं बनना चाहता ? सारा कुछ पैसे का मामला है. लेकिन है कोई जो चीज़ है जो पैसे से नहीं पटाई
जाती? वह है कश्मीरियों की जिद्द.
लेख में ‘वो भी तो आपकी कौम के थे!' (बांग्लादेशी) और 'वे भी तो आपकी ही कौम के हैं!’ (अफगानियों) आपने यह कह कर आप भी उस खड्डे में गिरे जहां कि श्री
मुनीर खुद गिरे हुए हैं. मज़हब के नाम पर कौम बनाना अवैध करार कर देना
चाहिए. एक तो साम्राज्य पीछा छोड़ने का नाम नहीं लेती, और चोरी के साथ साथ सीना चोरी के तौर पर है यह
धर्म के नाम पर है देश को बनाना, जो कि भारत-पाकिस्तान है. दोनों इस मामले में भी दुनिया के नाम पर कलंक है.
अंग्रेज गए तभी उन्होंने साम्राज्य को तोड़ कर
जाना चाहिए था। चाहे कोई कुछ भी बोले. जिन्नाह, गांधी, नेरहु, आंबेडकर जो भी हो, इनको तो बस साम्राज्य बहाल रखना था. और रखा भी! पर
स्वतंत्रता का क्या मायने रखा जाय, वह आज की राजानुमा प्रजा ही जाने! सही माने में साम्राज्य को रोक कर लोकतंत्र को
लाना चाहिए था. हर एक को अपना वतन अपनी अपनी मात्रुभाषाएं के
सीमित तक के देश के लिए समर्पित होना चाहिए था जैसे कि सारी दुनिया में आम तौर पर
है. ऐसा होता तो गांधी और जिन्ना अपना हिंदू-मुसलमान
ज़गड़ा अपने गुजरात तक ही सीमित रहता. काश्मीर क्या, और क्यों इस की बात तो कोसो दूर रहती. देशों के अपने अपने शकलें के लिए अपने अपने नुमाइंदें
होते.
लेकिन अभी तो लोगों की नज़र बस इस पर सीमित है कि, उन्हों ने चोरीछुप्पी आकर हमारे निर्दोष लोगों को मारे, हम पर आतंक फैलाया है. हम भी कुछ कम नहीं है.
हमारा आतंक तो अधिकृत रहेगा, वैद्द रहेगा, यहां के लोगों की मान्यता के साथ, सोच समझ के साथ. आए हुए महेमान को उनका विझा रद्द करके, सामान का आदानप्रदान बंद करके, और पानी बंद करके हम अपनी ओर से ज़ोर कसेंगे! उससे
परेशान सिर्फ निर्दोष आम आदमी ही क्यों न हो? भारत माता की जय!
छोटा एक काश्मीर की जिद्द ने न तो पाकिस्तान को
छोड़ा है न कि भारत को. दोनो साम्राज्यों के बीच, इन छोटा सा कश्मीर के नाम पर एक नाहक तबाही हो
रही है जो सारी दुनिया देख रही है. और नहीं तो और, हवाई क्षेत्र को बंद करने पर अंतर्राष्टीय निकायों
द्वारा तत्काल निंदा की जानी चाहिए। ईंधन की बर्बादी को एक अपराध समझना चाहिए! एक छोटा कश्मीर क्या क्या करायेगा इन
साम्राजवादियों से?
शायद एक छोटा कश्मीर ही है जो इन दो
साम्राजवादियों को सही मायने में आज़ादी का मायना बता सकता है. आखीर में. उम्मीद कायम रखें!
१०.४४ सुबह, ०५-०५-२०२५