बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

भारत यानी कि एक 'बर्बर' देश वाली उपलब्धि

मनन करने योग्य मातृभाषा का महत्त्व

इतिहास के प्रकाण्ड पण्डित डॉ. रघुबीर प्रायः फ्रांस जाया करते थे. वे सदा फ्रांस के राजवंश के एक परिवार के यहाँ ठहरा करते थे। उस पिरवार में एक ग्यारह साल की सुन्दर लड़की भी थी। वह भी डॉ. रघुबीर की खूब सेवा करती थी। एक बार डॉ. रघुबीर को भारत से एक लिफाफा प्राप्त हुआ। बच्ची को उत्सुकता हुई। देखें तो भारत की भाषा की लिपि कैसी है। उसने कहा - अंकल!  लिफाफा खोलकर पत्र दिखायें। डॉ. रघुबीरने टालना चाहा, पर बच्ची जिद पर अड़ गयी। डॉ. रघुबीर को पत्र दिखाना पड़ा। पत्र देखते ही बच्ची का मुँह लटक गया। अरे, यह तो अंग्रेजी में लिखा हुआ है। आपके देशकी कोई भाषा नहीं है?’

डॉ. रघुबीरसे कुछ कहते नहीं बना। बच्ची उदास होकर चली गयी। माँ को सारी बात बतायी। दोपहर में हमेशा की तरह सब ने साथ-साथ खाना तो खाया, पर पहले दिनों की तरह उत्साह और चहक-महक नहीं थी।   गृहस्वामिनी बोली डॉ. रघुबीर! आगेसे आप किसी और जगह रहा करें। जिसकी कोई अपनी भाषा नहीं होती, उसे हम फ्रेंच बर्बर कहते हैं। ऐसे लोगों से कोई सम्बन्ध नहीं रखते। गृहस्वामिनी ने उन्हें आगे बताया मेरी माता लोरेन प्रदेश के ड्यूक की कन्या थीं। प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व वह फ्रेंचभाषी प्रदेश जर्मनी के अधीन था। जर्मन सम्राट ने वहाँ फ्रेंच के माध्यम से शिक्षण बन्द कर के जर्मन भाषा थोप दी थी। फलतः प्रदेश का सारा कामकाज एकमात्र जर्मन भाषा में होता था, फ्रेंच के लिये वहाँ कोई स्थान न था। स्वभावतः विद्यालयमें भी शिक्षाका माध्यम जर्मन भाषा ही थी। मेरी माँ उस समय ग्यारह वर्ष की थीं और सर्वश्रेष्ट कान्वेणट विद्यालय में पढ़ती थीं।

एक बार जर्मन सम्राज्ञी कैथराइन लोरेनका दौरा करती हुई उस विद्यालय का निरीक्षण करने आ पहुंचीं। मेरी माता अपूर्व सुन्दरी होने के साथ अत्यन्त कुशाग्र-बुद्धि भीं थीं। सब बच्चियाँ नये कपड़ों में सज-धजकर आयी थीं। उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा किया गया था।

 बच्चियों के जर्मन व्यायाम, खेल आदि प्रदर्शन के बाद सम्राज्ञी ने पूछा कि क्या कोई बच्ची जर्मन राष्ट्रगान सुना सकती है?’

मेरी माँको छोड़ वह किसी को याद न था। मेरी माँ ने उसे ऐसे शद्ध जर्मन उच्चारण के साथ इतने सुन्दर ढंगसे गाया कि सम्राज्ञी ने बेच्ची से कुछ इनाम मांगने को कहा। बच्ची चुप रही। बार-बार आग्रह कर ने पर वह बोली महारानीजी, क्या जो कुछ मैं मांगूं, वह आप देंगी?’

सम्राज्ञी ने उत्तेजत होकर कहा बच्ची!  मैं सम्राज्ञी हूँ। मेरा वचन कभी झूठ नहीं होता। तुम जो चाहो माँगो। इस पर मेरी माताने कहा महारानीजी!  यदि आप सचमुच वचन पर दृढ़ हैं, तो मेरी केवल एक ही प्रार्थना है कि अब आगे से इस प्रदेश में सारा काम एकमात्र फ्रेंच भाषा में हो, जर्मन में नहीं।

इस सर्वथा अप्रत्याशित माँग को सुनकर सम्राज्ञी पहले तो आश्चर्यचकित रह गयीं, किंतु फिर क्रोध से लाल हो उठीं। वे बोली  'लड़की नेपोलियन की सेनाओं ने भी जर्मनी पर कभी ऐसा कठोर प्रहार नहीं किया था, जैसा आज तूने शक्तिशाली जर्मनी साम्राज्य पर किया है। सम्राज्ञी होनेके कारण मेरा वचन झूठा नहीं हो सकता, पर तुम जैसी छोटी-सी लड़की ने इतनी बड़ी महारानी को आज पराजय दी है, वह मैं कभी नहीं भूल सकती। जर्मनी ने जो अपने बाहुबल से जीता था, उसे तूने अपने वाणीमात्र से लौटा लिया। मैं भली-भाँति जानती हूँ कि जब आगे लोरेन प्रदेश अधिक दिनों तक जर्मनों के अधीन न रह सकेगा।‘  यह कहकर माहरानी अतीव उदास होकर वाहाँसे चली गयीं। 

गृहस्वामिनीने कहा डॉ. रघुबीर, इस घटनासे आप समझ सकते हैं कि मैं किस माँ की बेटी हूँ। 

हम फ्रेंच लोग संसार में सबसे अधिक गौरव अपनी भाषा को देते हैं, क्योंकि हमारे लिए राष्ट्रप्रेम और भाषा में कोई अन्तर नहीं. हमें अपनी भाषा मिल गयी। आगे चलकर हमें जर्मनों से स्वतन्त्रता भी प्राप्त हो गयी। तो आप समझ रहे हैं ना।‘ 

इसीलिये कहा गया है - निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

03-02-2025 

कल्याण, गीताप्रेस, गोरखपुर

Kalayana November 2024


मेरी टिप्पणीः  जो बीज बोए गए उसी का तो फल सामने आता है. आज के आधुनिक भारत के बीज कहां से आये थे?  वे बीज थे बर्गर नेहरू के रूप में, बर्गर गांधी के रूप में. और और सारे बर्गर जो अंग्रेज और अंग्रेजी से सुधरे हुए लोग थे. साथ साथ यह भी कहा जाय कि अंग्रेज और अंग्रेजी से सुधरे हुए लोग तो हुए लेकिन स्तुती का एक भी शब्द बाहर न निकलना उस को ही ता कहते हैं बर्गर। 

बस उन्हीं का चला और आज भी चल रहा है, उन्हीं की उपज से आज देश चल रहा है और लेख में डॉ. रघुबीर का खत की भाषा भी इसी कारणास्वरूप है.  चलो तो यह तो सिद्ध हो गया कि हम बर्गर हैं. सिद्धांत यह पेश होता है कि कभी देशभक्ती और भाषाओं के साथसाथ न जोड़ा जाए. राष्ट्रप्रेम और भाषामें कोई अन्तर नहीं ऐसा तो कतई ही नहीं होना चाहिए। नहीं तो देश देश न रहेगा, न तो हिंदुस्तान बन पायेगा, न तो पाकिस्तान. और यह दो खास अच्छे से बर्गर के खानदान के है. जोकि न घर के न घाट के होने दावा करते हैं।

11:48 सांय, 05-02-2025


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें