रविवार, 20 जुलाई 2025

सीधी सी एक बात!!

 Sarita/editorial

Operation Sindoor : सिंदूर का राजनीतिकरण


मेरी टिप्पणी- भाजप जैसी वोटों बटोरने पर चित्त संस्था कोई नहीं होगी. हर पहलू में वोटों को तलाशने से  विरोधी पार्टीयों का आराम छीन कर रखा है. यह सब, पहलगाम हमला, एक मौके के तौर पर लिया गया है लेकिन आप की इस के पहले की संपादिका में (जुन प्रथम) उनसे पूरी सहमती जताई है, वहां तक की  आप ने कहा है कि कश्मीर का पहलगाम में की गयी आतंकवादियों की हरकतों का नुकसान पाकिस्तान की सेना के साथ वहां की आम जनता को भी सहना पड़ेगा, यह पक्का है.  मेरे लिए तो यह बात तो अत्यंत अस्वीकार करने वाली बात बनती है.

 भाजपा की बुनियादी ढांचा ही पाकिस्तान और पाकिस्तानियों या तो कहिये कि आम मुसलमानों को नफरत की नजरों से देखना,  इन से पाई हुई विरासत को भी रोजमर्रा ज़िन्दगी से मिटाना, यानीकि चमकीले शहरों के नाम जैसे, औरंगाबाद, इस्लामपूर को मिटाना .  हां. लेकीन आप भी इसमे शामिल होंगे इस की थोड़ी कम उमीद थी.

 अगर हम क्रिया और प्रतिक्रिया की बात करें तो एक बाजू है अनौपचारिक तौर पर बने पड़े थे चार-छे लोग, उसमें ज्यादा तर तो शुद्ध भारतीय नागरीक कहलाने वाले लोग थे.   और मरे, मारे तो कितने मरे?  लेकिन भारत की  तरफ से तो पूरजोश शुद्ध औपचारिक मामला बना.  मरने-मारने की तो कोई संख्या नहीं. करोड़ों रूपयों का मामला बना.  मिसाईल या कोई गोलाबारूद कोई सस्ते नहीं. और नहीं तो और  हमारी पूरज़ोर प्रतिक्रिया के बारे में दुनिया भर में विश्वास पैदा करने के लिए संसदीय प्रतिनिधिमंडल का भेजना, उसका सारा खर्च भी तो हुआ! और दुश्मनी को और मज़बूत करने पर विमानों को पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र से दूर हट कर चलाना पड़ना, उससे होता हुआ दुर्लभ इंधन व्यय, पैसे का व्यय और प्रदूषण में योगदान करना. ये सब का पहलगाम का प्रतिक्रया में शामिल होना!  इस टाईम का आतंकी हमला ने तो खासी कमाल कर दी!  

इस संपादकीय में (जुलै, प्रथम) आप ठीक लाईन में आ गये यह कह कर कि – पहलगाम में हुई 26 निर्दोष भारतीयों की मौतों की जिम्मेदारी मोदी के कंधे पर न आ जाए, इस के लिए पाकिस्तान पर बमबारी की गई.” बात गौरतलब है कि कश्मीर में सारी सरकारी यंत्रतंत्रे इस पर लगी हुई है कि जो हुआ वह न हो। पर इस टाईम भारतीय सरकार के यंत्रतंत्रे जरा मात खा गए. उसके बदले में पाकिस्तान की ओर बंदूक को दागना और पीछे अपने ही आंगन में यहांवहां घरों को जलाना, यह एक आत्मविष्वास का डगमगाने वाली बात दिखी.

आपने और कहा अपनी गलतियों को छिपाना और उन पर पानी फेरना हमारी संस्कृति का हिस्सा है.  यानीकि कहीए कि संस्कृति को सुझबुझ बिना सर्वोत्तम दर्जा नहीं मिलना चाहिये! यहां पर भारतीय संस्कृति  तो यह कहती है कि जो कोई भी कश्मीर को भारत से बिछड़ाना चाहते है वह देशद्रोही है, चाहे स्वयं काश्मिरी ही क्यों न हो!  संसदीय प्रतिनिधिमंडल का भी अहम काम असलियत छिपाना था। उनको सिर्फ आतंकी हमले पर ही लक्ष्य केंद्रीत करना था न कि कोई पीछे जमी हुई गल्तियों का अनुमान.

इस सिलसिले में हर एक पाकिस्तानी को दुश्मन समझना, उनका विज़ा रद्द करके उनको सीमापार ढकेलना, और नहीं तो और पाकिस्तानी कलाकारों के अंश कोई भारतीय सिनेमा में नजर न आये उस पर खबरदारी बरतना, यह सब हमारी मनमुराद संस्कृती में आ बैठता है. आज की भारतीय संस्कृती में कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है और इसे हर कोई विरोध करने वाला दुश्मन है. और इस पर हर कोई पाकिस्तानी विरोध न करे तो वह पाकिस्तानी कैसा?  इस दुशमनी को और परिभाषित करने की ज़रूरत नहीं बनती.

लेकिन यहां पर फिल्म दिवार का डायलोग बिल्कुल सटीक बैठता है.  भारत कहेगा कि मेरे पास एर शानदार भरोसेमंद सुरक्षा कवच है, शोहरत है, खुशहाली है, आगे दूर दूर तक प्रगती का पैगाम  है,  तो बोलो पाकिस्तान आप की पास क्या है?  पाकिस्तान कहेगा मेरे पास लोगों का दिल है.

इस डायलोग साफ तौर पर इस बात पर रोशनी डालता हुआ दिखाई पड़ रहा है कि पाकिस्तान और उनके चहेतों से संघर्श होना बंद क्यों नहीं हो पा रहा है.    

एक बात है जो हर बात का हल दिला सकता है. यह है कि संस्कृती  की खामिया को स्वीकार किया जाय जो इस लेख में आप ने किया है. संस्कृति आखिर में लोगों की अभिलाषाओं से बनती है. या तो मन की बात कह सकते हैं उससे बनती है. आदमी की मन की बात और उपरवाले की मन की बात कभी एक सी नहीं हो सकती. यह तो सब जानते हैं.  भारत, पाकिस्तान दोनों आदमियों की मन की बातों की देन है. सारी परेशानी इस मन की बात से जुड़ी हुई है. अगर कम से कम आज, मन की बातों को बाजू कर दें तो फिर होगा जो कुछ विधाता चाहता है, निसर्ग चाहता है.  विधाता यह चाहता है कि उसने तामीर की हुई भिन्नता को पूरा इन्साफ मिले.

 सिंधी हो या तामील या कि कश्मीरी सब विधाता की करामत है. आप जब राह पर कोई सिंधी या कश्मीरी से मिलते होंगे तो यह नहीं पूछते कि आप क्यों सिंधी हो या क्यों कश्मीरी हो.  आप का चेहरा वैसा क्यों है कि जैसा वह है?  सीधी सी एक बात!! जय हो विधाता की और संभालो आदमी निर्मित संस्कृतियों से!

11-22, 17-07-2025

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