मंगलवार, 18 मई 2021

हित का टकराव

वोट्सअप्प में फिरता हुआ एक विडीयो

Ajit Doval’s Big Lessons for Hindus and secular idiots 

हिंदुओं और धर्मनिरपेक्ष मूर्खों के लिए अजीत डोभाल का बड़ा सबक

उनके भाषण से कुछ सार और नीचे है उस पर मेरी टिप्पणी-

अजीत डोभाल -  "शक्ति का दूसरा सिद्धांत बताता हूँ.  मेरा विचार है.  सब नहीं तो कुछ लोगों को शायद इस विचार से सोचने की और कुछ करने की प्रेरणा मिलेगी.  इतिहास दुनिया की सब से बड़ी अदालत है. इतिहास का निर्णय हमेशा उस के पक्ष में गया है जो शक्तीशाली था. उसने कभी उसका साथ नहीं दिया जो न्याय के साथ था, जो सही था अगर ऐसा तो दिल्ली में बाबर रोड है लेकिन राणा सांगा रोड नहीं है. क्योंकि बाबर विजय हुआ राणा सांगा हारे.

भारत की हिंदूशाही किंगडम अफगानिस्तान से होती सिकुड़ती सिकुड़ती यहां तक नहीं आ जाती.   हम ने किसी पर आक्रमण नहीं किया. हमने किसी के जीवन मुल्य को नश्ट नहीं किया.  हमने किसी के धर्मग्रंथ और धर्मस्थानों को को नश्ट नहीं किया.  शायद हम न्याय संगत थे,  शायद सत्य भी हमारे पक्ष में था लेकीन शक्ती हमारे साथ नहीं थी. इस लिए इसिहास हमें उसकी सजा दी.  इतिहास नें हमेशा उनको सज़ा दी जिन्हों ने विचारों को जो  कर्म से और न्याय को  शक्ति से अधीक महत्त्व दिया. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि न्याय का अपना महत्तव नहीं है. लेकिन जभी conflict of interest (हित का टकराव)  हो तो शक्तिशाली बनना ज्यादा आवश्यक है. भारत धर्मगुरु भी तभी बनेगा जब एक शक्तिसाली का भारत निर्माण होगा.

जिन लोगों ने भारत के उपर आक्रमण किया, भारत के ऊपर राज किया, कि जाते वक़्त गुलामों को कह दिया कि तुम राज करो अभी हम तो जा रहे हैं. तो यहां पर गुलाम राजकर्ता  बन गये. अगर हम लडाय के उसूलों से देखे कि किसी भी राष्ट्र की comprehensive state power (व्यापक राज्य शक्ति) होती है जिससे वह लडाई लड़ता है  जिसको हम कहते के यह शक्तिसाली है दूसरा शक्तिशाली नहीं है, क्या यह घटक होते उसके तो  भारत के पास जनशक्ति, धनशक्ति, ज्ञान की शक्ति, टेक्नोलॉजी की शक्ति, और जिन लोगों ने आक्रमण किया उनके उनकी शक्ति से  अगर हम देखें तो शायद एक और हजार का भी अनुपात नहीं होता.  लेकिन उस के बाद भी हम वह नहीं कर पाए.

क्या कारण है कि इतिहास ने हमारा साथ नहीं दिया, हमारे पक्ष में न्याय नहीं दिया.  क्या कारण है कि काश्मीर में हम लड़ रहे हैं, हमारे पर आक्रमण हो रहा है, बाहर के लोक आकर violation (उल्लंघन)  हमारे border (सीमा) पर करते हैं,  infiltrators (गुसपैठियों) हमारे यहां आते हैं जब्कि पूरा के पूरा काश्मीर भारत का भाग है, अभिन्न भाग है, कानून के अनुसार वहां के राजा के  ने हस्ताक्सर किया, हमें दिया.

क्या कारण है कि करोड़ो की संख्या में बांगलादेशी आते हैं.  सुप्रीम कोर्ट भी यह कहता है कि भारत पर आक्रमण के बराबर है. 25 जुलै 2005 के निर्णय के तीन दिन के अंदर हमारे सरकार ने एक नया अधिनियम करके इन सारे कानूनो को फोरेनर एक्त में incorporate (शामिल) कर देती है और तात्पर्य यह है कि उस निर्णय को null and void (अमान्य) कर दिया।  यह सब बात हमें सोचने और समजने की आवश्यकता है. 

भारत विदेशों से इतना नहीं हारा.  अंग्रेजों ने एक लड़ाई नहीं जीती जिसमें कि अंग्रेजों की फोज में  भारतीय सिपाई नहीं थे. चाहे वह बेंगाल नेशनल आर्मी थी, 1857 में सीखों ने साथ दिया, जब सीखों से लड़ाई हो रही थी तो बाकी लोगों ने उनको साथ दिया. हमेशा native army (देशी सेना) उनके साथ थी. जब जब आक्रमण west (पश्चिम) से हुआ, चाहे वह मोंगोल थे, चाहे मुगल थे, तो लश्कर कहां बने?    वह तो थोड़े से लोग आये थे. लश्कर बने काबूल में, लोहोर में, सरहंद में, हिंदूस्थान को हराया है हमेशा हिंदूस्थान के लोगों ने, साथ नहीं दिया देश को. और दर्द है तो केवल इसी बात का.

भारत के इतिहास में दर्द केवल इस बात का नहीं है कि विदेशियों ने हमारे साथ क्या किया? उनका तो हम मुकाबला कर लेतें. दुःख इस बात का था कि हमारे सभी लोगों ने साथ नहीं निभाया और साथ नहीं दिया.  और इस की feeling (अनुभूती) आज भी मुझे इस देश में है.  और भारत की आंतरिय और बाहरी शक्तिओं से सब से बड़ा खतरा है वह खतरा इस बात का है कि हमारे अपने लोग ही कहीं राष्ट्र की सुरक्षा, राष्ट्र की अस्मिता, राष्ट्र के गौरव का सौदा न कर बैठे. अपने आज के सुख के लिए अपने भविष्य को अंधकार न बना दे.  और इस के लिए जो जागरूकता चाहिए, इस के लिए जो ताकत पैदा करनी है वह समाज के अंदर ही पैदा की जा सकती है.  उस को केवल आप लोग कर सकते हैं. वह यह केवल आज की युवा शक्ति कर सकती है."  


मेरी टिप्पणीः

 श्री अजीत डोभाल ने इधर युवा वर्ग में जागरूकता लाने की कोशिश की है कि उनकी मदद से ताकत पैदा की जाए क्योंकि हमारे अपने लोग ही कहीं राष्ट्र की सुरक्षा, राष्ट्र की अस्मिता, राष्ट्र के गौरव का सौदा न कर बैठे. अपने आज के सुख के लिए अपने भविष्य को अंधकार न बना दे

अच्छी बात यह है कि  साथ साथ उन्होंने कुछ प्रश्नों का खुलासा खुदबेखुद ही कर दिये।उन्हों ने कह दिया कि इतिहास ने शक्ति को ज्यादा साथ दिया है, न्याय को कम। काश्मीर में इसी सिद्धांत पर आज के भारत द्वारा शक्ति प्रयोग की जा रही है।  उन्होंने कहा है कि ज्यादा तर तो आदर्शरूप से न्याय की ही जीत होनी चाहिए लेकिन यहां तो अपनी अपनी हित का टकराव हो रहा है। यहां पर जो कौन सी चीज़ भारत के हित में है उस चीज़ पर ही बल दिया जा रहा है।  और भारतमाता की जय जैसा नारा दुनिया में और कोई बना ही नहीं।  लोकतंत्र में राजा का हस्ताक्षर क्या मायना रखता है? पर यहां तो भारत के हित का प्रश्न है, लोकतंत्र या न्याय का नहीं.

दुसरी जगह उन्हें ने बयान किया है कि हमारे सभी लोगों ने साथ नहीं निभाया, साथ नहीं दिया और उन्हों ने ही उस के कारण भी दिया है  कि 1857 में सीखों ने साथ दिया, जब सीखों से लड़ाई हो रही थी तो बाकी लोगों ने उनको (अंग्रेजों को) साथ दिया यानी कि सीख के सामने और थे और औरों के सामने सीख थे.  लेकिन साथ साथ में यह कहा कि  हमेशा native army (स्थानीय फौज)  उनके साथ थी.

यहां एक गल्ती पेश आती है कि स्थानीय फौज तो ज़रूर थी पर यह कहना भी ज़रूरी होना चाहिए कि कौन सी स्थानीय फौज का ज़िक्र हो रहा है? सीखों की? बेंगाली की? तामिळ की? गुर्खा की? अंग्रेजों ने इस विविधता को खूब पहेचाना था और उस का ही तो लाभ उठाया.

हमारे आदर्श भारतीयों के लिए स्थानीय फौज का मतलब है सिर्फ भारतीय फौज.  हम किसी भी हालत में भारत की अखंडता को ठेस पहुंचाना नहीं चाहते. चाहे दुनिया कितनी ही विविधता से बनी रहे हम सिर्फ भारतीय बनने में शक्ति का इस्तेमाल करेंगे, चाहे वह न्याय से विपरीत क्यों न हो।

भारत जब अभी धर्मगुरु  बनने में अपना ध्यान केंद्रीत कर रहा है तब उसमें हमें बाहरी भिन्नता, खास करके आंतरिय भिन्नता हमें रोक न ले!  , युवा शक्ति आप पर उम्मीद रखी हुई है!  यह श्री डोभाल के तरफ से अपील है.    

भारत का हिंदूशाही राज्य अफगानिस्तान से होती सिकुड़ती सिकुड़ती यहां तक नहीं आ जाती. यहां पर यह मतलब होता है कि भारत सिर्फ अफगानिस्तान तक ही सिमीत था, बाकी ता हिंदू धर्म के लिए गैर ही रहे थे और उस पर अफसोस क्या करना? हम हमारी आंतरिय भिन्नता पर इंस्तरी फैला देंगे और एक भारत बन कर डट कर खेड़े रहेंगे बाहरी भिन्नता के सामने! हम अपने राम कृश्ण शीव के लिए डट कर मुकाबला करेंगे और उनको कहेंगे कि हाँ, हमने इतनी ज़मीन, इतनी सिकुड़ी हुई ज़मीन तो कम से कस ले रख पाएं हैं,  लेकिन खबरदार,  आप की नज़र उन गैर –नापाक- लोगों पर पड़े!

12.57 दोपहर 18-05-2021

----------------------------------



सारा ब्लॉग पढ़ें -  खुद को बनाएं अपना


मेरे और ब्लोग्ज़ पर भी तशरीफ़ फरमाइये! :- 




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें