सोमवार, 8 नवंबर 2021

इतिहास के सारे पन्ने पवित्र

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29 October at 19:47hrs  ·

उधम सिंह फ़िल्म के अंतिम हिस्से में जलियावाला बाग हत्याकांड का एक लम्बा सीन फिल्माया गया है। रक्त से लथपथ, गोलियों से छलनी हुए लोगों के कटे फटे सैकड़ों-हजारों शव! कुछ मरे हुए, कुछ मर रहे, कुछ मरने की तैयारी में... और इनके बीच बदहवास सा भटकता एक युवक! कोई पानी मांग रहा हो, पर पानी लाने के पहले ही मर जाय...  एक ही साथ कटते बकरे की तरह तड़पते सैकड़ों लोग... आप देखेंगे तो सचमुच मन में अंग्रेजी व्यवस्था और अंग्रेजों के प्रति घृणा उपजेगी।

    इस दृश्य के लिए फ़िल्म की आलोचना हो रही है। तर्क यह है कि "इसे देखने के बाद अंग्रेजों के प्रति घृणा उत्पन्न हो रही है, जो ठीक नहीं। कलाजगत को प्रेम बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए, कि घृणा..."

    कितना हास्यास्पद तर्क है ! यदि फ़िल्म में दिखाया जाय तो क्या भारत जलियावाला हत्याकांड की क्रूरता भूल जाएगा? क्या जापान हिरोशिमा और नागासाकी पर गिरे परमाणु बम को भूल सकता है? चार पीढियां बीत गयीं, पर उस क्षेत्र में अब भी बच्चे विकलांग पैदा होते हैं। वहाँ के लोगों में यह विकृति अनुवांशिक हो गयी है। यह कितनी पीढ़ियों तक चलेगा, इसे कोई नहीं जानता। क्या यह भूल जाने लायक बात है? क्या अमेरिका वर्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले को कभी भूल पायेगा? नहीं!

    और इन क्रूर घटनाओं को भूलना ही क्यों? इन घटनाओं और इन्हें अंजाम देने वाली विचारधारा से घृणा क्यों की जाय? घृणा को नकारात्मक भाव बता कर सच से आँख चुरा लेना मूर्खता है, जो अंततः नाश करती है।

    एक थोथी दलील दी जाती है कभी कभी कि 'पाप से घृणा करो, पापी से नहीं' मैं समझ नहीं पाता कि पापी से घृणा क्यों करें? जिस क्रूर आतंकी ने कई हजार निर्दोष और निहत्थे बच्चे, बूढ़े और स्त्रियों को निर्मम और विभत्स मृत्यु दी, उससे क्यों घृणा की जाय? जो विचारधारा हजारों-लाखों हत्याओं की जिम्मेवार हो, उससे कैसे हम घृणा करें?

    आम लोग किताबी विचारकों की नहीं सुनते! वे परिस्थितियों के हिसाब से ही निर्णय लेते हैं। वे प्रेम भी करते हैं और घृणा भी... डायर हो, डलहौजी हो या माउंटबेटन... बाबर हो, औरंगजेब हो या खिलजी... गोरी हो, गजनवी हो या तैमूर, आम भारतीय लोग उनसे केवल और केवल घृणा ही करते हैं।

    हालांकि यह भी सच है कि फ़िल्म उस घटना का नाट्य रूपांतरण भर है! निर्देशक और कलाकार अपना सारा सामर्थ्य झोंक कर भी उस भाव को उत्पन्न नहीं कर सकते, जो सचमुच उस हृदय विदारक घटना को देख कर तब के लोगों के मन में उपजे होंगे। जितनी घृणा फ़िल्म देख कर हमारे मन में आज अंग्रेजों के विरुद्ध उपज रही है, उधम सिंह और उनके जैसे अन्य युवकों के मन में इससे हजार गुनी अधिक घृणा उपजी होगी। वही घृणा ही उधम सिंह का शस्त्र बनी, जिससे उन्होंने उस आततायी का वध किया।

    जिस दृश्य के लिए फ़िल्म की आलोचना हो रही है, वही दृश्य उस फिल्म की जान है। भारत को आतंकियों का आतंक याद रखना ही होगा, तभी भविष्य सुखमय होगा। अन्यथा डायर या औरंगजेब जैसे क्रूर आतंकी कभी भी सकते हैं।

(साभार सर्वेश भैया

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मेरी टिप्पणी:  सबसे बड़ी कमी इसमे दिखाई दी रही है वह है विधाता का लापत्ता होना।  हम उसको हो सके इतना दूर रखना चाहते हैं जाने क्यों उस के दायरे में कुछ है ही नहीं.  आदमी जभी चला जाता है तो हम कहते हैं कि उपरवाले के पास चला गया है। फिर इसके उपर हम ज्यादा घोर नहीं करते हैं।  इसी तरह इतिहास के पन्ने भी पवित्र ठरते हैं।  इस के कोई हिस्से से घृणा करना, उपरवाले से घृणा करना होता है।

आम लोग परिस्थितियों के हिसाब से ही निर्णय लेते हैं।“  बिलकूल सही।  जैसे कि उधम सिंह का पात्र रहा।  पर परिस्थिति जब इतिहास में जमा हो गई हो, उसमे पात्र कोई भी हो, उसे आदरांजली ही देनी चाहिये क्योंकि दुनिया चलती है वह उपरवाले का आशिर्वाद से ही चली है।  घृणा करना वैसे ही किसी भी सोच समझने में पाप की श्रेणी में होता होगा।

5.22 सांय, 07-11-2021  


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