समाज
Judicial System : ईश्वर का न्याय बनाम मनुष्य की बनाई कानून व्यवस्था
शकील प्रेम / May 30, 2025
मेरी टिप्पणीः अगस्त (प्रथम) अंक में प्रकाशित लेख 'फेल है ईश्वर की न्याय व्यवस्था' लेख सरिता में बार बार आते हुए, गहराई की रोशनी डालते हुए भी गहराई इतनी नहीं उतर पाती कि बात पूरी तरह से सुलझ जाये.
सरिता से ही उठाए गए ये शब्दों यह बताता है कि इस विषय का सुलझना अपने ही आंखो के सामने खड़ा है लेकिन
हमें और आगे नहीं जाना है - 'बात तार्किक दृष्टिकोण से समझें तो सारे धर्मग्रंथ इतिहास
के चालाक इंसानों ने ही लिखे हैं और इन चालाक लोगों ने ही अपने लाभ और परिस्थितियों
के हिसाब से पाप और पुण्य की व्याख्या की है. यही वजह है कि जो धर्मग्रंथ जितना पुराना
है वह आज उतना ही आउट डेटेड है और उस में लिखी बातें उतनी ही अप्रासंगिक हैं.'
मूलभूत बात यह है
कि हम आज और कल को अलग अलग दर्जा दे रखा है. कल को पवित्र के क्षेणी में लिया जाता
है, उससे ईश्वर से जुड़ा जाता है कि उससे हमें डरना चाहिए जबकि आज से ईश्वर अप्रासंगिक
रखा जाता है, आज की जो हम रह रहें जिंदगी को एक चोरीछुपी किये जाने वाली एक मानवीय कृति
समझी जाती है. ‘ईश्वर का न्याय बनाम मनुष्य की बनाई कानून
व्यवस्था’ इस शीर्षक में ही खोट नजर आती है कि ईश्वर और मनुष्य को अलग
अलग रखा गया है जबकि दोनो भी एक ही संकल्पना है.
ईश्वर और उससे जुड़ा हुआ धर्म मनुष्य की ही कल्पना है. और क्या मनुष्य की
बनाई कानून व्यवस्था की बात क्या निजी मनूष्य की ही बात बनती है? अगर कल ईश्वर लोगों
के साथ हिलमिल करता था तो फिर आज भी वह अपने कंधे से कंधे मिलाकर फिर रहा है.
कल की बात पूरानी ऐसा
समझ कर ईश्वर को भी पूराने वाले दर्जा दे कर ढकेल दिया जाय और सिर्फ जब कभी त्योहार हो उसे मनुष्यों
के दरबार में हाजिर किया जाय, पूजा की जाय, तो यह कोन सी ठीक बात बनती है?
ईश्वर को मूर्तियों मे ढकेल देने के बजाय उसे हर एक कण में, वर्तमान के कण में, हर एक नियती के पल में, आदमी, बिल्ली, कुत्ते हर किसी में उनकी ही झलक समझना यह सब आपको विश्वास पैदा करना चाहिए. जन्म में भी ईश्वर, मरने में भी ईश्वर, मारने में भी ईश्वर, उत्थान में भी ईश्वर, पतन में भी ईश्वर.
ईश्वर हर पल के
जिम्मेदार है. यह नहीं कि उसे मंदिर में बैठा दिया जाय और हम जो कहे उस हिसाब से
वह रहे और हम समझे उस हिसाब से दुनिया भर के लोग रहे.
जिंदगी में बहुत कुछ बातें रास नहीं आतीं.
आपका का तो सिर्फ एक एक काम रहना चाहिए. कि ईश्वर की लीला देखते देखते अपनी
जिंदगी को गुजारना चाहिए.
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