गुरुवार, 4 जून 2026

श्रीकृष्ण की कुछ और ही सोच

 

संजीव दुबे,  एटावा, उत्तर प्रदेश

मुहम्मद गौरी का दूसरा आगमन... राहूल गांधी आज की पॉलिटिक्स में कोई आम चेहरा नहीं हैं, बल्कि एंटी-इंडिया इकोसिस्टम का सबसे बड़ा मोहरा हैं। उन्हें देखकर मुझे बार-बार भारतीय इतिहास के शायद सबसे काले पन्नों से मुहम्मद गौरी की याद आती है....

मुहम्मद गौरी 16 बार हारा लेकिन 17वीं बार जीतकर उन्होंने भारत को सदियों की गुलामी में डाल दिया। राहुल गांधी भी लगातार चुनाव हारते हैं, जनता उन्हें बार-बार रिजेक्ट करती है, लेकिन उनके पीछे लेफ्टिस्ट गैंग, इस्लामिक वोट बैंक और विदेशी ताकतों का ऐसा नेटवर्क है कि अगर वह एक बार भी कामयाब हो गए, तो वह भारत को उसी अंधेरे में धकेल देंगे।

मुहम्मद गौरी को उस समय भारत में कई गद्दारों का सपोर्ट था, और इसी तरह राहुल गांधी को आज के सेक्युलर हिंदू, जातिवादी पावर-ब्रोकर, विदेशी फंड से चलने वाले कन्वर्जन माफिया, तथाकथित शांतिप्रिय और टुकड़े-टुकड़े करने वाले गैंग सपोर्ट कर रहे हैं।

जब भी कोई सरकार घुसपैठियों, आतंकवादियों या धर्म बदलने वाले गैंग के खिलाफ एक्शन लेती है राहूल गांधी सवसे पहले उनका बचाव करने के लिए आगे आते हैं। यह कोई इत्तेफाक नहीं है, यह उनका एजेंडा है।

राम मंदिर बनने से लेकर आर्टिकल तीन सौ सत्तर हटाने, पहलगाम टेरर अटैक और ऑपरेशन सिंदूर तक, कांग्रेस और राहुल गांधी ने हमेशा हिंदुओं की आस्था और भारत की एकता का विरोध किया है।

हिंदू आतंकवाद की झूठी कहानी बनाकर पूरी दुनिया मे हिदुओं को बदनाम करने की गंदी साजिशों के  लिए वे ही जिम्मेदार हैं। पाकिस्तान और चीन की भाषा बोलना, मणिपुर की आग में घी डालना और अलगाववादियों को बढ़ावा देना यही उनकी पॉलिटिक्स है।

राहुल गांधी भारत की परंपराओं और सनातन धर्म पर सवाल उठाना कभी नहीं भूलते। हिंदू आस्था का सम्मान करना उनके DNA में नहीं है।

इसलिए इस्लामक वोट बैंक ही उनकी असली ताकत है।

नेहरू से लेकर सोनिया तक, कांग्रेस की विरासत भारत को कमजोर और विदेशी ताकतों पर निर्भर रखने की रही है। राहुल गांधी उसी एजेंडे के वारिस हैं।

उनका सपना भारत को आत्मनिर्भर बनाना नहीं, बल्कि इसे विदेशी ताकतों का गुलाम बनाए रखना है।

मुहम्मद गौरी ने तलवार के दम पर भारत को गुलाम बनाया था, राहुल गांधी भी तुष्टिकरण, वोट बैंक की राजनीति, विदेशी फंडिंग और धोखेबाज सेक्युलरिज्म से वही काम करना चाहते हैं। इसलिए, उन्हें मुहम्मद गैरी का दूसरा अवतार कहना कोई बड़ी बात न होगी.... उनके लिए भारत सिर्फ एक बाजार है और हिंदू धर्म सिर्फ एक मजाक है।

इसलिए राहुल गांधी को चुनाव हराना काफी नहीं है। असली राष्ट्रीय कर्तव्य उनकी पूरी राजनीति को जड से खत्म करना है। क्योंकि अगर हम भारत को नागरिक, एक बार भी गलती करते हैं, तो वह भारत को उसी गुलामी में डाल देंगे जो हमारे पूर्वजों ने सदियों तक झेली।

राहुल गांधी सिर्फ एक हारने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि भारत विरोधी ताकतों का एक जहरीला औजार हौ। 


मेरी टिप्पणीः आज के दिन भाजपा जैसी अपने आपको असुरक्षित समझने वाली और हठिली पार्टी कोई नहीं होगी. विडीयो में यह सब चुनावों की पृष्ठभूमि में ऐसे हथकंडे करने में भाजपा लाचार है.

मैं धोखेबाज सेक्युलरिज्मकी नुमाईंदगी करना चाहने वालों में से हूँ और यहां पर मेंने बाजी पलटने का मौका पाया है.

मेरे हिसाब से मुहम्मद गौरी की जितनी तुलना प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से की जा सकती है  उतनी तुलना राहुल गांधी से नहीं की जा सकती; जहां तक लोकतांत्रिक रवैयों की बात की जाय.

मुहम्मद गौरी के ज़माने में प्रजातंत्र प्रणाली थी ही नहीं कि जाना जाय कि वह कितना लोकतांत्रिक था.  उस वक़्त राजा और राजा की भीड़ हुई, तलवार निकली, कि जो जीता वह सिकंदर.  प्रजा सो कोई लेना देना नहीं. राजा बदलता, प्रजा वहीं के वहीं रहती. यह तो अंग्रेजों ने आकर गुल खिलाया, इस में प्रजा को भी पिरोही या गया,  और मच गई प्रजा में तबाही ही तबाही.

लेकिन हर एक की बात एक सी रही है।  हर एक का एजेंडा एक ही है। यानीकि भारत पर चढ़ाई करना! सिद्धांत सब का एक. फारसी भाषा पर काबू रखने वाले गौरी को गैर फार्सी पर धावा क्यों बोलना चाहा?  वैसे ही गैर हिंदी श्री नरेंद्र मोदी को हिंदी भाषीयों से क्या लेना देना होना चाहिए?  राहूल गांधी और उन्के टुकड़े-टुकड़े करने वाले गैंग भी ऐसा कुछ नहीं कहते की देश को सही पैमाने पर आज़ाद करवाना चाहते हैं।  सब का ही तो यही फैसला है कि अंग्रेजों से आज़ादी यानि की संपुर्ण आज़ादी.

लेकिन अंग्रेज हो या तो मुहम्मद गौरी, उनकी जितनी तारीफ की जाय इतनी कम है. दूरदराज़ समुद्रपार या वेरान रेगिस्तान से बिलकुल अनजान एलाके में आ कर चढ़ाई करना और अपने ताबे में लाना वह कतई आसान काम नहीं.  और यहां पर बैठे बैठे चढ़ाई करने का खेल श्री नरेंद्र मोदी और श्री रारुल गांधी मशगुल होते हुए हैं.

हां, पर इस लेख लिखने वाले, विडीयो बनाने वाले  संजीव दुबे ने तारीफ तो कर ही डाली यह कह कर कि सबसे काले पन्नों से मुहम्मद गौरी की याद आती है..., और राहुल गांधी की विदेशी ताकत भारत को उसी अंधेरे में धकेल कर  भारत को उसी गुलामी में डाल देंगे जो हमारे पूर्वज ने सदियों तक झेली।

एकटेदुकटे लोग जो भारतीयों के सेंकड़ो की सदियों तक गुलामी में रखने में कामयाब रहे उसे में से ही भारतीयों का कथाकठित 5000 वर्ष पुरानी संस्कृति का प्रमाण अपने आप उभर कर सामने आता है। यहां पर भाजप का असुर्क्षित होना, हठिली होने का कारण खुदबेखूद सामने आ जा रहा है.

एक तो दूर दराज़ से आना, न कोई स्थानीय भाषा का जानना,  भाषा सीखना और न सिर्फ सीखना अपनी भाषा सिखाना.  और इतनी सिखाना कि सारे देश की अधिकृत भाषा ही वह हो सके. और नहीं तो और इतनी सीखी-सिखाई जाय कि कुछ लोग उसे अपनी ही भाषा समझने लगे.  फारसी भाषा को लादना वह अपने आपकी अदभूत बात थी.  अंग्रेजी आई और आज भारत उसी भाषा पर टिका हुआ है चाहे आप अपने आप स्वतंत्र समझो या गुलाम.  जीत तो आखिर में बाहर की संकृती ही की हुई है.

फारसीओंने, अंग्रेजीओंने बानबनाए शहर, इमारतें, रास्ते के नामों बदल ने का काम अनैतिक कमों में विश्वास रखने वाले ही कर सकते हैं, कमज़ोर रही  सस्कृति ही करा सकती है.

श्री भागवद गीता दो हिस्सों में बटा है। एक है अर्जुन का हिस्सा, दुसरा श्री कृष्ण का हिस्सा.  महात्मा गांधी हो या कोई और, भारतीय संस्कृति सिर्फ अर्जुन तक ही सिमीत रह पाती है।  ‘मन की बात अर्जुन की इच्छाओं को दरशाता है. चाहे कितना ही राम मंदीर बनाया याद, पूजा, अर्चना, पाठ किया जाय, वह खाना, यह खाने पर परहेज़, व्रत रखें जाय, बाज़ी सारी विदेशियों के पक्ष में चले जाने की संभावना हमेशा रही है।

यही कुछ जवाब दे रही है कि भाजपा के लिए असुरक्षित सा माहोल क्यों सदा के लिए बना रहा है।  राहुल गांधी का चेहरा उनके लिए क्यों डरावना सा लगता रहता हैशायद वह समझ चुकें हैं कि श्री राम पर मात किया जा सकता है, पर श्री कृष्ण की कुछ और ही सोच रहती है.

यह तो सब बात करने की बात है.

4:33 p.m. 31-05-2026 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें